ड्रग्स, शराब, सोना और नकदी: लोकसभा चुनाव में हुई कुल 34,56,22,00,000 रुपये की बरामदगी
नई दिल्ली
अप्रैल 16 से पहले तमिलनाडु के वेल्लोर संसदीय क्षेत्र में शायद लोगों ने कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके क्षेत्र में माहौल ऐसे भी बन सकते हैं कि मतदान से केवल 2 दिन पहले संसदीय चुनाव ही रद्द कर दिए जाएं. अगर किसी के मन में ये ख्याल आया भी हो, तो मुमकिन है कि उसकी वजह खुलेआम व्यापक तौर से बंट रहे नोट नहीं होंगे.
नोटों का बंटना भारतीय चुनाव में कोई नई बात नहीं है. देखा जाए तो कई मायने में यह चुनावी परंपरा का अभिन्न अंग बन चुका है. दुर्भाग्यवश और सत्य. यह एक ऐसी रीत है जो पूरे देश में प्रचलित है. इसका विरोध चुनाव आयोग समय-समय पर करता रहा है, पर कुरीति का विरोध करना और कुरीति को रोकने के लिए कड़े कदम उठाना दो अलग बातें हैं.
इस संदर्भ में देखा जाए तो 16 अप्रैल कोई मामूली तारीख नहीं थी. यह एक ऐसी तारीख थी जिसे ये कुरीति गवारा नहीं थी. मानो इस तारीख ने ही ठान लिया था कि आज परिस्थितियां बदलेंगी और वेल्लोर समेत समूचा हिंदुस्तान उस बदलाव का गवाह बनेगा.
16 अप्रैल को जब चुनाव आयोग ने वेल्लोर संसदीय क्षेत्र में चुनाव रद्द करने की घोषणा की तो इस घोषणा के साथ ही वह तारीख और वह संसदीय क्षेत्र इतिहास में दर्ज हो गए. भारत में ऐसा पहली बार हो रहा था कि किसी संसदीय क्षेत्र में चुनाव इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि समय रहते अधिकारियों ने व्यापक रूप से हो रहे नोटों के बंटवारे की तैयारी का भंडाफोड़ कर दिया था. इससे पहले भी ऐसे निर्णय लिए गए हैं, लेकिन वो विधानसभा चुनाव या राज्यसभा चुनाव के दौरान लिए गए थे.
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