बिना गारे-सीमेंट के 11वीं सदी से अडिग ककनमठ, 115 फीट ऊंचा शिवालय आज भी इंजीनियरों के लिए रहस्य

बिना गारे-सीमेंट के 11वीं सदी से अडिग ककनमठ, 115 फीट ऊंचा शिवालय आज भी इंजीनियरों के लिए रहस्य

awdhesh dandotiya
मुरैना/पोरसा। सावन के पहले सोमवार पर देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी। कहीं कांवडिय़ों का सैलाब होगा तो कहीं भोलेनाथ का जलाभिषेक। इन्हीं प्रसिद्ध शिवधामों के बीच चंबल अंचल का एक ऐसा शिवालय भी है, जो केवल आस्था ही नहीं बल्कि अपनी अद्भुत निर्माण कला के कारण भी लोगों को चौंका देता है। मुरैना जिले के अंबाह विकासखंड के सिहोनियां गांव में स्थित ककनमठ शिव मंदिर करीब एक हजार वर्षों से बिना चूना, गारा और सीमेंट के लगभग 115 फीट की ऊंचाई पर आज भी मजबूती से खड़ा है।
मंदिर को पहली बार देखने वाला हर व्यक्ति कुछ पल के लिए ठहर जाता है। विशाल शिलाओं को एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार संतुलित किया गया है कि लगता है मानो वे अभी गिर पड़ेंगी, लेकिन सदियों से यह मंदिर आंधी, बारिश, भूकंप जैसे प्राकृतिक प्रभावों को झेलते हुए आज भी अडिग खड़ा है। यही कारण है कि इसकी निर्माण तकनीक आज भी इंजीनियरों और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए शोध का विषय बनी हुई है। इतिहासकारों के अनुसार ककनमठ मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कच्छपघात राजवंश के शासक कीर्तिराज ने भगवान शिव को समर्पित कराया था। मंदिर का नाम उनकी धर्मपत्नी रानी ककनावती के नाम पर पड़ा। स्थानीय मान्यता है कि रानी भगवान शिव की परम भक्त थीं और प्रतिदिन पूजा-अर्चना के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती थीं। उनकी श्रद्धा के सम्मान में इस भव्य शिवालय का निर्माण कराया गया। ककनमठ उत्तर भारतीय नागर शैली की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। मंदिर में कहीं भी चूना, गारा या सीमेंट का उपयोग दिखाई नहीं देता। विशाल पत्थरों को केवल उनके भार और संतुलन के आधार पर इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि पूरा ढांचा स्वयं अपने वजन पर टिके रहने में सक्षम है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।