आदिवासियों को गुलामी की ओर ले जाती आधुनिकता!

ब्रम्हदीप अलूने
उड़ीसा की मलकानगिरी की पहाड़ियों के नीचे बसा है कोमिकुलांग। इन गर्मियों में जब मैं मोटर साइकिल से सुकमा जिले के कोमिकुलांग जा रहा था तो रास्ते में कई जगह लकड़ी के अवरोध लगा कर रोड़ ब्लॉक कर रखा था। इसी रास्ते में एक गांव पड़ता है कोटलापारा,जहां की कुख्यात नक्सली मुन्नी रहने वाली थी। 5 लाख इनाम की यह नक्सली एरिया कमांडर थी जिसे इस साल जनवरी में कटे कल्याण की पहाड़ियों से लगे मार्जुम में सुरक्षा बलों ने मार गिराया था।
कोटलापारा गांव में बहुत ही संकरे रास्ते में एक वृक्ष की शाख से रास्ता रोककर 6-7 साल की दो लड़कियां स्टील का एक डिब्बा लेकर खड़ी थी। इस समय आदिवासियों का एक त्यौहार होता है और ये लड़कियां राहगीरों से चंदा मांग रही थी। मैंने उन्हें दस रूपये का एक सिक्का दिया तो उन्होंने लेने से मना कर दिया। मैंने उनसे कारण पूछा तो बोला कि यहां सिर्फ नोट चलता है। जब उस मासूम बच्ची को दस रूपये का नोट थमाया तो उसकी ख़ुशी देखने लायक थी। तब ही लकड़ी का बेरिकेड्स हटाकर मै मलकानगिरी की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ पाया। जहां यह लड़कियां बेरिकेड्स लगाकर खड़ी थी, वहीं रोड़ किनारे एक मारे गए नक्सली का कथित शहीद स्मारक खड़ा था। नक्सली का यह स्मारक पक्की ईंटों से बना था लेकिन उसके आसपास सारी झोपडियां घास फूंस की थी।
2008 की एक घटना है। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित अतिसंवेदनशील नारायणपुर जिले के माड में नक्सलियों ने एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस लगाकर सुरक्षाबलों की एक जीप को उड़ा दिया था। इस हमलें में पांच जवान शहीद हो गए थे। जीप के पीछे चलने वाले एक अन्य वाहन में सवार सुरक्षाबलों ने देखा की उस जंगल में थोड़ी ही दूरी पर एक 10-11 साल का लड़का खड़ा है। सुरक्षाबलों ने उस मासूम लड़के से पूछताछ की तो देखा की उसके हाथ में 10 रुपये का एक नोट है। लड़के ने बताया की नक्सलियों ने उसे 10 रूपये देकर कहा था कि जब भी सुरक्षाबलों का वाहन इस रोड़ से गुजरे तब इस वायर को जोड़ देना है। उसने ऐसा ही किया और इसमें पांच जवान शहीद हो गए थे।

सुकमा जिलें में घना जंगल है और वनोपज की कोई कमी नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार वन धन विकास योजना के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य भी देती है, लेकिन यहां से आदिवासी आर्थिक फायदे की समझ से ही कोसो दूर है। यहीं कारण है कि इन भोले भाले आदिवासियों से व्यापारियों द्वारा अनाज के बदले वनोपज लिया जाता है। छत्तीसगढ़ में तकरीबन 50 फीसदी वन है और सुकमा में तो यह बढ़कर 65 से 70 तक हो जाता है। बस्तर में खूब पानी बरसता है,यहां की जलवायु ठंडी और नम है। यहां की जमीन चावल की खेती के मुफीद है। लेकिन यहां रहने वाले आदिवासी ने न तो धान के महत्व को समझा है और न ही उन्हें धान के कटोरे के फायदे समझने की कूबत उनमें पैदा की गई है। आदिवासियों को विभिन्न कार्यक्रमों के लिए चावल की आवश्यकता अधिक होती है इसलिए वे व्यापारियों को अपना वनोपज देकर चावल प्राप्त कर रहे हैं। इन दिनों एक किलो गीले आंवले के बदले तीन किलो चावल और सूखे आंवला के बदले चार किलो चावल पलटी में दिया जा रहा है। आंवला में विटामिन-सी प्रचुर मात्र में होता है,जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मददगार होता है। इन आदिवासियों के लिए आंवला चावल प्राप्त करने का जरिया है।
इन दिनों सुकमा और बीजापुर सीमा पर स्थित सिलगेर में एक आंदोलन चल रहा है। इसमें आदिवासियों की मांग है कि यहां से सीआरपीएफ़ का कैम्प हटा लिया जाएं। सिलगेर का यह इलाका घने जंगल में है और नक्सलियों का यहां बड़ा प्रभाव है. सीआरपीएफ़ के जवानों का ध्यान इस प्रदर्शन से ज्यादा रोड़ निर्माण पर है। यह सड़क सुकमा जिले के जगरगुंडा को बीजापुर के आवापल्ली से जोड़ रही है। आदिवासियों के भविष्य के लिए सड़क बनना बेहतर सन्देश है लेकिन नक्सलियों के लिए सड़क संकट का सबब है। क्योंकि सड़क से विकास होगा और यह विकास नक्सलवाद को कमजोर कर देंगा,इसलिए पुलिस का यह दावा की विरोध को नक्सलियों का समर्थन प्राप्त है, इसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता। दरअसल जंगल में रहने वाले आदिवासी नक्सलियों की बात को मानने के लिए मजबूर होते है, नहीं तो उनका जिंदा रहना मुश्किल है। इस दबाव में वे सुरक्षाबलों की जानकारियां नक्सलियों को देते है,वे नक्सली हमलों में मदद करने के लिए भी मजबूर कर दिए जाते है। यहां के वनों से महुआ, इमली, टोरा, तेंदूपत्ता जैसे अन्य कई वनोपज घने जंगलों से आदिवासी एकत्रित करते हैं और इसे साप्ताहिक बाजारों में बेचकर अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के समान खरीदते हैं। नक्सली इलाकों में कई आईईडी हमलों के लिए नक्सली इन आदिवासियों का उपयोग कर लेते है। सुरक्षाबलों के लिए हमेशा यह संदिग्ध होते है और यही कारण है कि दोनों और अविश्वास पनपा रहता है।
सुकमा जिले के बुर्कापाल में 2017 में एक नक्सली हमलें में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए थे। इस हमले के बाद नक्सलियों का साथ देने के जुर्म में पुलिस द्वारा बुर्कापाल और उससे लगे आसपास के गांव से 121 ग्रामीणों को गिरफ्तार किया था। इस साल एनआईए की कोर्ट ने इन ग्रामीणों को दोषमुक्त करने का फैसला सुनाया है। पुलिस कोर्ट में नक़्सलियो के समर्थक के रूप में ग्रामीणों के खिलाफ कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाई। जिसके चलते 5 साल तक केंद्रीय जेल में सजा काटने के बाद कोर्ट से मिले फैसले के बाद इन्हें रिहा कर दिया गया। पुलिस का यहां के जंगलों में जाना आसान काम नहीं है और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आदिवासी नक्सलियों के खिलाफ गवाही देने से ज्यादा जेल जाना पसंद करते है। यहां आदिवासियों की हालात घुन जैसी है जो नक्सलियों और पुलिस के बीच पिसने को मजबूर है।
बस्तर के इलाकों में नदिया,वन सब कुछ है जो आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकता है। आदिवासी अपनी संस्कृति को जीवित रखने के लिए बाहरी मेलजोल को खतरनाक समझते है। आज़ादी के बाद की सरकारें आदिवासियों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो ही नहीं पाई की वे आदिवासी सभ्यता से बिना छेड़छाड़ किए उनका जीवन बेहतर बनाएंगी। आदिवासी क्षेत्रों की वनोपज और प्राकृतिक संसाधनों पर पूंजीवादी ताकतों की नजर होती है और सरकारें इन्हीं पूंजीपतियों के प्रभाव से चलती है। आदिवासियों की जमीने खरीदने पर प्रतिबन्ध है और यह अवैधानिक है। पूंजीपतियों ने यहां भी रास्ता ढूंढ लिया है, वे गरीब आदिवासियों को नौकर बनाकर रखते है और उनके नाम से ही आदिवासियों की जमीने सस्ते दाम पर खरीद लेते है। गरीब मजबूर आदिवासी लड़कियों से नाम मात्र का विवाह करके उसके नाम से जमीन खरीदने का चलन भी बढ़ा है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के बडवानी, धार, झाबुआ, आलीराजपुर से लेकर बालाघाट घाट तक यह देखने को मिल सकता है।
समस्या यह है कि हम विकास को आधुनिकता से जोड़ते है और यह आदिवासियों को स्वीकार नहीं है। जंगल में वे स्वछंद और स्वतंत्र है जबकि आधुनिकता उन्हें गुलाम बना रही है। सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासी इलाकों में विकास का मतलब आदिवासियों की गुलामी न होने पाएं। आज़ाद भारत में आदिवासियों की समस्या को लेकर नासमझी बदस्तूर जारी है। यह नासमझी नक्सलवाद और पूंजीपतियों को प्रश्रय दे रही है तथा इसका खामियाजा गरीब आदिवासी भोगने को मजबूर है।
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