बीएचयू के वनस्पति विभाग में उगा चीनी पौधा, मलेरिया को देगा टक्कर

बीएचयू के वनस्पति विभाग में उगा चीनी पौधा, मलेरिया को देगा टक्कर


वाराणसी
चीन के अत्यधिक ठंडे क्षेत्र में पाया जाने वाला मलेरियारोधी पौधा आर्टिमिसिया अनुआ अब भारत के गर्म स्थानों में भी पनप सकेगा। बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने टिशू कल्चर के जरिये इसकी प्रकृति में बदलाव किया है। इस पौधे की पत्ती का काढ़ा काफी फायदेमंद है और इसमें एलर्जीरोधी तत्व पाये गये हैं।

वनस्पति विभाग की प्रो. शशि पाण्डेय के नेतृत्व में प्रयोग हो रहा है। आर्टिमिसिया अनुआ को सफलतापूर्वक प्रयोगशाला में उगाया गया। पौधे में आर्टिमिसिया रसायन समुचित मात्रा में मौजूद रहा। इसे पराबैगनी किरणों से उपचारित किया गया तो रसायन की मात्रा दो गुनी हो गई। इसे क्षारीय भूमि में भी उगने लायक बना लिया गया है। इसकी खेती बंजर जमीन पर भी की जा सकेगी।

इस शोध में डॉ. नेहा पाण्डेय, डॉ. अंजना कुमारी, नीरज गोस्वामी, निधि राय तथा रामप्रसाद मीना शामिल हैं। इस औषधीय पौधे की पत्तियों व फूल से मस्तिष्क ज्वर व मलेरिया की दवा बनाई जाती है। इस दवा के खिलाफ अभी बैक्टीरिया प्रतिरोधी क्षमता विकसित नहीं कर पाए हैं। आधुनिक चिकित्सा के अलावा अब लोग पारंपरिक औषधियों से चिकित्सा की ओर लौट रहे हैं। आर्टिमिसिया की प्रजातियों में अनुआ विशेष है। चीन में इसका सबसे पहले उपयोग बुखार की दवा के रूप में किया गया।

चूहों और बंदरों को इसकी पत्ती खिलाकर मलेरिया ठीक किया गया। इसकी खोज चीनी वैज्ञानिक यूयूतू ने की थी। वैश्विक स्तर पर चीन व वियतनाम आर्टिमिसिया का 70 फीसदी उत्पादन करते हैं। मलेरिया के अतिरिक्त इसका उपयोग जीवाणुओं तथा कवकों के अलावा कैंसर तथा अस्थमा के उपचार में भी प्रयोग किया जाता है। प्रो. शशि पाण्डेय कहना है कि आर्टिमिसिया अनुआ की पत्तियों में मलेरियारोधी तत्व मौजूद हैं। इससे खाने की गोली व इंजेक्शन तैयार किए जाते हैं। इसका उत्पादन कम होने से मांग पूरी नहीं हो पा रही है। पौधे की उत्पादन क्षमता बढ़ा कर कमी पूरी की जा सकती है।

पांच करोड़ लोगों को मलेरिया
दुनिया भर में तीन से पांच करोड़ लोग प्रतिवर्ष मलेरिया से ग्रसित होते हैं। इनमें से 30 लाख की मौत हो जाती है। वर्तमान सयम में विश्व की कुल आबादी का 40 प्रतिशत भाग मलेरिया से प्रभावित है। इसमें ज्यादातर पांच साल से कम उम्र के बच्चे है। मलेरिया एक परजीवी के कारण होने वाला रोग है। इसका संचरण मादा एनाफीलीज मच्छर से होता है। यह भौगोलिक क्षेत्र व क्षेत्रीय जलवायु पर निर्भर होता है।

मलेरिया से जूझ रहा भारत
1880 में पहली बार चार्ल्स अल्फोंसे लुईस लारेवान ने मलेरिया रोग के कारण खोजा। दक्षिण एशिया, भारत, अफ्रीका, प्यूपा, न्यूनिया, मध्य तथा दक्षिण अमेरिका में इसका ज्यादा प्रकोप है। भारत कई दशकों से मलेरिया से जूझ रहा है। 1953 में पहलीबार भारत सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया नियत्रण कार्यक्रम किया। 1958 में वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की ओर से राष्ट्रीय उन्मूलन कार्यक्रम हुआ। बावजूद इसके मलेरिया नियंत्रण में सफलता नहीं मिली।