सिकरवार ने पाला बदल भाजपा को दिया झटका, ग्वालियर पूर्व में बराबरी की जंग

सिकरवार ने पाला बदल भाजपा को दिया झटका, ग्वालियर पूर्व में बराबरी की जंग
भोपाल। ग्वालियर के कद्दावर भाजपा नेता सतीश सिकरवार ने कांग्रेस का दामन थाम कर ग्वालियर पूर्व विधानसभा सीट पर उपचुनाव को रोचक बना दिया है। सतीश सिकरवार को कांग्रेस ग्वालियर पूर्व सीट से अपना उम्मीदवार बना सकती है। दरअसल 2018 विधानसभा चुनाव में सतीश सिकरवार ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, उनके सामने कांग्रेस से मुन्नालाल गोयल थे। चुनाव नतीजों में मुन्नालाल गोयल ने सतीश सिकरवार को शिकस्त दी थी, लेकिन 15 महीने बाद ही बदले राजनीतिक घटनाक्रम में मुन्नालाल गोयल ने सिंधिया के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया। इस दल बदल के बाद से ही सतीश सिकरवार नाराज माने जा रहे थे। भाजपा के नेताओं की ओर से उन्हें कई बार मनाने की कोशिशें भी की गई, लेकिन यह कोशिशें नाकाम ही साबित हुईं। अब सिकरवार के कांग्रेस में शामिल होने से ग्वालियर पूर्व विधानसभा सीट पर बराबरी का मुकाबला हो गया है। मुन्नालाल गोयल पहली बार विधायक बने थे। उन्होंने 2018 में भाजपा प्रत्याशी सतीश सिंह सिकरवार को 17,819 वोट से हराया था। वहीं वोटकटवा उम्मीदवारों को 11,154 वोट मिला था। भाजपा के सर्वे में यह तथ्य आया है कि इस बार वोटकटवा उम्मीदवार मुन्नालाल गोयल पर भारी पड़ सकते हैं। इस सीट पर कुल 1,73,601 वोट पड़े थे। गोयल को 90,133, सिकरवार को 72,314 और बसपा के भूरीसिंह को 5,446 वोट मिले थे। यहां कुल 11 प्रत्याशी मैदान में थे। अभी तक बराबरी कार मुकाबला मप्र में होने वाले उपचुनाव करीब आने के साथ ही ये भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य पर केंद्रित होते जा रहे हैं। कांग्रेस लगातार उन्हें निशाने पर रखे हुए है, तो भाजपा सिंधिया को तवज्जो देकर कदम बढ़ा रही है। ऐसे में ग्वालियर पूर्व विस सीट की जंग भी अहम हो गई है। पिछले तीन दशक में हुए विस चुनावों में भाजपा-कांग्रेस ने तीन-तीन बार जीत दर्ज की है। 1993, 98 और 2018 में कांग्रेस ने तो 2003, 08 और 13 में भाजपा ने यहां किला फतह किया है। 2018 में कांग्रेस के टिकट पर मुन्नालाल गोयल ने जीत दर्ज की, लेकिन इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। काफी हद तक संभव है कि उन्हें ही भाजपा से टिकट मिले। ऐसे में कांग्रेस अपना किला बचाने की कोशिश करेगी, वहीं भाजपा वापसी की जंग जीतना चाहेगी। वैसे भी इस सीट पर अधिकतर मुकाबले कांटेदार रहे हैं, तो इस बार भी मुकाबला रोचक होना तय माना जा रहा है। पेयजल सबसे अहम मुद्दा इस विधानसभा क्षेत्र के मुद्दों में पेयजल सबसे अहम है। हर चुनाव में इस पर चर्चा होती है। मुरार नदी का जीर्णोद्धार जनता चाहती है, जिससे पानी की समस्या का समाधान हो सके। स्वास्थ्य सेवाएं भी लोगों की जरूरतों के अनुरूप न होने की बात उठती रही है। अतिक्रमण न हटने से लोग लंबे समय से परेशान हैं। अतिक्रमण के चलते क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं। जातीय समीकरण ये सीट जातीय समीकरणों से प्रभावित होती रही है। गुर्जर, यादव और ठाकुर वर्ग का वर्चस्व विधानसभा सीट पर बतौर मजबूत वोट बैंक प्रभाव रखता रहा है। इस क्षेत्र में 16.9 प्रतिशत ब्राह्मण, 10.2 प्रतिशतजाटव, 9 प्रतिशत बनिया, 7.8 प्रतिशत यादव, 6.8 प्रतिशत मुस्लिम, और 6.4 प्रतिशत ठाकुर हैं। इस उपचुनाव में भी राजनीतिक दल और संभावित निर्दलीय इन वर्गों को अपने पक्ष में साधने की कोशिश कर रहे हैं। ग्वालियर पूर्व विस सीट के सियासी मिजाज को समझने के लिए पिछले तीन दशक के चुनावों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यहां बराबरी का मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा है, जबकि बसपा तीसरी पार्टी के रुप में कुछ खास कभी नहीं कर सकी। ये सीट 2003 तक लश्कर ईस्ट के नाम से जानी जाती थी। 1993 के चुनाव में यहां से कांग्रेस के आरके गोयल ने भाजपा को हराकर जीत दर्ज की थी। 1998 में कांग्रेस के रमेश अग्रवाल ने कांटे के मुकाबले में भाजपा के विवेक शेजवलकर को महज 317 वोटों से पराजित किया था। हालांकि इसके बाद भाजपा ने यहां मेहनत की और 2003 में इसे अपने नाम कर ली। इस चुनाव में अग्रवाल ये सीट बरकरार नहीं रख सके। भाजपा के अनूप मिश्रा ने उन्हें 12 हजार 716 वोटों से हरा दिया। वर्ष 2008 के विस चुनाव में अनूप मिश्रा कांटे के मुकाबले में 1538 वोट से कांग्रेस के मुन्नालाल गोयल को हराकर ये सीट बचाने में कामयाब रहे। इस सीट पर पहली बार बसपा ने सबसे ज्यादा वोट शेयर 16.3 प्रतिशत हासिल किया था। हालांकि फिर भी वह मुख्य मुकाबले में जगह नहीं बना सकी थी। 2013 में भाजपा ने प्रत्याशी बदल दिया। एक बार फिर कांटे के मुकाबले में ये सीट बचा ली। पार्टी की प्रत्याशी रहीं माया सिंह ने 2112 वोटों से कांग्रेस के गोयल को पराजित कर दिया। बसपा के 12.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर रही। 2018 के चुनाव में जब भाजपा के हाथों से सत्ता फिसली तो ये सीट भी उसे गंवानी पड़ी थी। कांग्रेस के मुन्नालाल गोयल ने 15 साल से जारी भाजपा के कब्जे को खत्म करते हुए जीत दर्ज की थी। उन्होंने भाजपा के सतीश सिंह सिकवार को 17 हजार 819 वोटों से पराजित किया। बसपा तेज गिरावट के साथ महज 3.2 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर सकी। अब खुद गोयल भाजपा में हैं, तो कांग्रेस नए चेहरे को मौका देने की तैयारी में है। ऐसे में जंग रोचक हो सकती है। वैसे नजरें बसपा पर भी है। यदि वह मजबूत प्रत्याशी उतारती है तो इस सीट पर पहली बार मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।