पांच दशक में पहली बार देश में नहीं होगा कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री, केरल में आखिरी गढ़ भी ध्वस्त
नई दिल्ली। भारत में लेफ्ट पार्टियां अपना आधार खोती दिख रही हैं। केरल में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की हार वाम दलों के लिए बड़ा झटका है। पांच दशकों में पहली बार होगा, जब भारत में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा।
पश्चिम बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के खराब प्रदर्शन के साथ, जो राज्य 1977 से 2011 तक लेफ्ट का गढ़ था, ये हार मतदाताओं द्वारा वाम दलों को खारिज करने का ट्रेंड दिखाती हैं।
केरल में 2016 में सत्ता में आई पिनाराई विजयन सरकार को कम्युनिस्ट शासन का आखिरी गढ़ माना जा रहा था, क्योंकि 2011 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के 34 साल के शासन को खत्म कर दिया था। इसके बाद 2018 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने त्रिपुरा में लेफ्ट फ्रंट के 25 साल के राज को खत्म कर दिया था।
केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) करीब 99 सीटों पर आगे है। जबकि LDF सिर्फ 35 सीटों पर आगे है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की बढ़त का असर लेफ्ट की लगातार गिरावट की ओर इशारा करता है।
पश्चिम बंगाल में, वाम दलों ने एक बार फिर खराब प्रदर्शन किया है। 294 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ एक सीट पर बढ़त हासिल की है। बंगाल में BJP की बढ़त वोटरों में दक्षिणपंथी रुझान को दिखाती है, जो लेफ्ट से साफ तौर पर अलग होने का संकेत है।
लेफ्ट के आधार में की गिरावट कोई अचानक नहीं बल्कि लगातार हो रही है, जो 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद शुरू हुई, जब लेफ्ट पार्टियों ने 59 सीटें जीतीं और कांग्रेस के नेतृत्व में UPA सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। 2009 तक, उनकी सीटें घटकर 24 रह गईं। 2014 में लेफ्ट दलों को फिर झटका लगा और उनकी सीटें गिरकर 10 रह गईं और 2019 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ पांच रह गईं। वर्तमान में, लेफ्ट के पास सिर्फ छह लोकसभा सीटें हैं।
माना जा रहा है कि युवा, करिश्माई नेतृत्व की कमी, वैश्वीकरण, निजीकरण पर एक बेमेल वैचारिक रुख, और मजदूरों और श्रमिकों को एकजुट करने में नाकामयाबी ने इस लगातार गिरावट में योगदान दिया है। इन वजहों ने लेफ्ट पार्टियों को भारत के बदलते राजनीतिक माहौल में अप्रासंगिक होने की कगार पर ला खड़ा किया है।
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