सत्ता परिवर्तन से बुनियादी समस्याएं हल नहीं होतीं, समाधान के लिए हों आंदोलन: मोहन भागवत
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी समारोह में अपने संबोधन के दौरान देश-दुनिया में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलनों का होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए, न कि समाज में द्वेष, वैमनस्य और विभाजन को बढ़ावा देना।
भागवत ने कहा कि सत्ता परिवर्तन से बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होता। कई बार विरोध प्रदर्शन राजनीतिक लाभ हासिल करने का माध्यम बन जाते हैं। ऐसे आंदोलनों से समस्याएं सुलझने के बजाय समाज में आपसी दूरियां बढ़ने का खतरा रहता है।
भारत, हिन्दू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं(dismantling) इस का विचार कर योजना बना कर आसुरी ताकतें कार्य करती हैं । उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें सहायता के लिये मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता स्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं। - सरसंघचालक मोहन भागवत जी
— RSS (@RSSorg) October 20, 2026
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बांग्लादेश, नेपाल और अन्य देशों का दिया उदाहरण
RSS प्रमुख ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया में हुई राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ ताकतें अपने हितों को साधने के लिए राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करती हैं। हालांकि, सत्ता परिवर्तन से हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आंदोलनों के कारण समाज में कड़वाहट और विभाजन की स्थिति पैदा न हो। राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन को अपने आचरण में संवैधानिक मर्यादाओं तथा सभ्य संवाद के मानकों का पालन करना चाहिए।
भागवत ने कहा कि भारत का मजबूत होना उन ताकतों के लिए चुनौती बन सकता है, जो दुनिया में अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहती हैं। उनके अनुसार, कुछ वैश्विक शक्तियां भारत के विकास का समर्थन तो करती हैं, लेकिन भारत के अत्यधिक शक्तिशाली बनने को लेकर आशंकित भी रहती हैं।
समाज में एकता बनाए रखने पर जोर
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने के उद्देश्य से कुछ ताकतें योजनाबद्ध तरीके से काम करती हैं। उनके मुताबिक, स्वार्थ और विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता भी ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि समाज में समस्याएं और व्यवस्था की कमियां होना स्वाभाविक है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए आंदोलन किए जा सकते हैं, लेकिन आंदोलनों के दौरान ऐसे कार्यों से बचना चाहिए, जिनसे लोगों के बीच अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा हो।
OTT प्लेटफॉर्म पर अनुशासन की जरूरत
मोहन भागवत ने डिजिटल माध्यमों और नई पीढ़ी पर उनके प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारियों को युवा पीढ़ी कई बार उचित-अनुचित का विचार किए बिना स्वीकार कर लेती है। इसके दुष्परिणामों को देखते हुए कई देशों में कुछ अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में भी विशेष रूप से OTT प्लेटफॉर्म को लेकर अनुशासन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस विषय पर शासन और प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
युवाओं में नशे की लत गंभीर चिंता
RSS प्रमुख ने युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति को गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताते हुए कहा कि इसे रोकने के लिए समय रहते प्रयास किए जाने चाहिए। इसके लिए शासन-प्रशासन के साथ समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को युवाओं में सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करनी होगी। जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी के जरिए नई पीढ़ी को नशे से दूर रखने के प्रयास जरूरी हैं।
विकास के लिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी
मोहन भागवत ने विज्ञान और तकनीक की प्रगति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे जीवन अधिक सुविधाजनक बनता है और ज्ञान तथा तर्क के आधार पर समस्याओं को समझने में मदद मिलती है। हालांकि, तकनीक को केवल एक साधन के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने आगाह किया कि यदि विकास का आधार केवल उपभोग और भौतिक सुविधाएं हों, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इसलिए विकास की ऐसी दृष्टि अपनाने की जरूरत है, जिसमें पर्यावरण, समाज और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बना रहे।
भागवत ने नेपाल में आई प्राकृतिक त्रासदी का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्र में असंतुलित विकास के प्रभावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत, तिब्बत, भूटान और चीन सहित विभिन्न क्षेत्रों में फैले हिमालयी भूभाग के विकास को समग्र दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
उन्होंने जोर दिया कि देश की प्रगति के लिए आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण तथा नैतिक मूल्यों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
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