धरती अघाई भी नहीं, 400 बोरिंग की मंजूरी

इंदौर
बारिश का कोटा अभी पूरा भी नहीं हुआ और जिला प्रशासन ने बोरिंग की अनुमति देना शुरू कर दी। गर्मी में जो 400 आवेदन लंबित थे, सभी पर मंजूरी दे दी गई। इसके लिए न कोई नियम आड़े आया और न भू-महालेखागार की टीम के निर्देश। वहीं बिना परमिशन नलकूप खुदाई पर भी पाबंदी नहीं लगाई जा रही। कई लोग एक मंजूरी की आड़ में दो-तीन बोरिंग करवा रहे हैं। यहां तक कि कलेक्टर द्वारा लगाई गई धारा-144 का भी असर दिखाई नहीं दे रहा है।

शहर में तेजी से गिरता भू-जल स्तर चिंता का विषय है। गर्मी शुरू होते ही जिले के कई इलाकों में 500 से 700 फीट गहराई में पानी नहीं निकलने पर अधिकांश बोरिंग फेल हो जाते हैं। इसे देखते हुए मई में केंद्रीय भू-जल अभिकरण ने इंदौर में बोरवेल का ऑडिट कराया था। ग्वालियर महालेखागार (एजी) की टीम पहली बार खातों के बजाय वाटर ऑडिट करने आई थी। इस दल ने पांच साल में जिन्हें बोरिंग की अनुमित दी गई थी, उनका रिकॉर्ड खंगाला। इनमें से 58 बोरिंग रेंडम आधार पर चुने थे।

इनमें एक भी बोरिंग में नियम का पालन नहीं किया गया था। टीम ने नाराज होकर कलेक्टर को कई निर्देश भी दिए थे। साथ ही पूरे जिले में हुए वैध व अवैध बोरिंगों की जानकारी निकालने और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड व जल का विनियमन पर्यावरण संरक्षण अधिनियिम-1986 के तहत बोरिंग मामले में सख्ती बरतने के लिए भी कहा था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। शहर में पानी की समस्या गहराने के बाद पहली बार ऐसा हुआ था कि पानी का ऑडिट करने कोई टीम शहर पहुंची।

ये है नियम

- सरकारी विभागों, नगर निगम, स्कूल, रहवासी संघ जहां पानी की समस्या आती है वहीं पर बोरिंग की मंजूरी दी जाए, निजी अस्पतालों को मंजूरी नहीं दी जाए।

- बोरिंग की अनुमति से पहले देखा जाए कि उस क्षेत्र में नर्मदा या जलापूर्ति की लाइन नगर निगम ने दी या नहीं। लाइन नहीं होने पर ही मंजूरी दी जाए।

- बोरिंग के बाद क्षेत्र में पानी की लाइन डली या नहीं। लाइन डलने पर बोरिंग को सील किया जाए।

- कहीं पर बोरिंग है तो पड़ोस में अन्य बोरिंग की अनुमति नहीं दी जाए। जरूरत पड़ने पर पड़ोस से ही पानी लेना होगा। पड़ोसी को इसी आधार पर मंजूरी मिलती है कि वह पानी देने से इंकार नहीं कर सकता।