चार जिलो के विधायक पहुचे बालाघाट, पुलिस के खिलाफ खोला मोर्चा
मांगो पर सरकार नही हुई गंभीर तो कुछ भी हो सकते है परिणाम-नारायण पट्टा
rafi ahmad ansari
बालाघाट। गढी थाना क्षेत्र के बसपहरा के जंगल में पुलिस की गोली का शिकार हुए छत्तिसगढ के बालसमुद निवासी झामसिंग धुर्वे का मामला अब आंदोलन का रूप ले चुका है। जहां बालसमुद निवासी ग्रामीण झामसिंग धुर्वे को न्याय दिलाने अब दो राज्यो के आदिवासी समाज ने कमर कस ली है और सडक पर उतर पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोलकर आंदोलन शुरू कर दिये है। झामसिंग धुर्वे सहित पूर्व में नक्सली पुलिस मुठभेंड में मारे गये बेकसूर आदिवासी ग्रामीण और नक्सली बताकर गिरफ्तार किये गये ग्रामीणो से जुडे उन तमाम मामले को लेकर आदिवासी समाज अब एकजुट होकर प्र्रदर्शन कर रहा है, तो वही मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, सिवनी जिले के विधायक कांधा से कांधा मिलाकर आदिवासियों के हित में आंदोलन को मजबूती प्रदान कर रहे है।

नक्सली मामले को लेकर आदिवासीयों पर हो रहे पुलिस के अत्याचार से आदिवासी समुदाय के सब्र का बांध अब फुट चुका है और वे बेगुनाहो को न्याय दिलाने सडक पर उतर गये है। जहां आज 15 सितम्बर को बालाघाट जिला मुख्यालय में आदिवासी समुदाय का जनसैलाब देखने मिला। यह जन-सैलाब उत्कृष्ठ मैदान से प्रारंभ होकर सिरवैया चौक पर आकर समाप्त हो गया, क्योकि आदिवासियों के आक्रोश को देखते हुए पुलिस अधिकारियों ने सुरक्षा की दृष्टि से चप्पे चप्पे पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था तथा जगह जगह बेरिकेट लगा दिये थे। आदिवासी विकास परिषद् सहित विभिन्न आदिवासी संगठनो के बेनर तले मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, सिवनी जिले के विधायको और इन जिलो सहित छ.ग कबीरधाम के क्षेत्रिय प्रतिनिधियों के द्वारा जिला मुख्यालय में आज 15 सितम्बर को आंदोलन कर झामसिंग धुर्वे के फर्जी इंकाउन्टर मामले में ज्ञापन सौंपा गया। आदिवासी समुदाय ने एकता का परिचय देते हुए झामसिंग धुर्वे को इंसाफ दिलाने सडक पर उतरकर जिला प्रशासन को चेताया है कि वे आदिवासीयों पर हुए उन तमाम अत्याचार मामले की न्यायिक जांच करवायें। इस संबध में बैहर क्षेत्र के आदिवासी विधायक संजय उईके ने बताया कि पुलिस-नक्सली मुठभेंड और अन्य मौके पर आदिवासीयों के साथ पुलिस के द्वारा जो ज्यादतियां की गई है उसको लेकर सामाजिक स्तर पर आदिवासी समाज खडा हो गया है। इस मामले को राजनीतिक रंग नही दे रहे है, बल्कि समाज स्तर पर ही उठाया जा रहा है।

वही प्रदर्शनकारी आदिवासी जनप्रतिनिधियों का कहना है कि विगत कई वर्षो से शासन प्रशासन द्वारा आदिवासी क्षेत्रो में नक्सलियों का दखल बताया जा रहा है और इसके आड में आदिवासी ग्रामीण मजदूरो के उपर नक्सली मुखबीर होने, नक्सलियों को सहयोग करने एवं नक्सली संगम सदस्य बताकर अपराध पंजीबद्ध करके ग्रामीणो को जेल भेज रहे है, तो कही आदिवासीयों को नक्सली समझकर गोली मार दी जा रही है। और यह सबकुछ पुलिस अपनी पदोन्नती, शासन का फंड व अन्य फायदा लेने के लिये फर्जी तरिके से ऐसे कृत्य कर रही है।

वही बरघाट विधायक अंर्जुन काकोडिया ने कहा कि 06 सितम्बर को एसी के निर्देश पर गढी क्षेत्र में तैनात पुलिस बल व हॉकफोर्स दल ने बालसमुंद निवासी झामसिंग धुर्वे को नक्सली होने के संदेह में 50 मीटर की दूरी से गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। जबकि झामसिंग धुर्वे अपने साथी नैनसिंह के साथ वनक्षेत्र में पारम्पारिक तरिके से मछली पकडने गये हुए थे। उसके बाद शव को म.प्र की सीमा में लाया और उसे नक्सली गिरोह का सदस्य साबित करने के लिये उसके शव के पास भरमार बंदूक और खाद्य सामाग्री रख दी। जब झामसिंग धुर्वे के इस फर्जी इंकाउन्टर का खुलासा हुआ तो पुलिस अब सबूत मिटाने परिवार पर दबाव बना रही है और उन्हे प्रलोभन देने का प्रयास कर रही है। परिवार शिकायत कर अपरांध पंजीबद्ध कराना चाहता है तो पुलिस मामला दर्ज नही कर रही है। यह न्याय संगत नहीं है, बल्कि घोर निंदनीय कार्य है।
बता दे, झामसिंग धुर्वे के फर्जी इंकाउन्टर मामले को लेकर आदिवासी समुदाय के तमाम लोगों में शासन प्रशासन के प्रति भारी असंतोष और आक्रोश है और वे 15 दिन के अंदर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। साथ ही नक्सली उन्मूलन में तैनात पुलिस बल व हॉकफोर्स के दल पर हत्या कर नक्सली बताने की साजिश का मामला पंजीबद्ध कर उनके उपर आईपीसी की धारा 302 307 201 147 148 149 120 (बी) सेक्शन 3(2)5/ एस.सी एक्ट के तहत अपराध पंजीबद्ध करने की मांग कर रहे है। वही बालाघाट पुलिस अधीक्षक अभिषेक तिवारी को बालाघाट से तत्काल हटाने की मांग की है। आंदोलन में शामिल आंक्रोशित समुदाय ने राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर पुलिस बल पर हत्या का अपराध दर्ज करने, एसपी को जिले से हटाने, मृतक के दोनों पुत्रों को सरकारी नौकरी देने एवं परिवार को एक करोड रुपए मुआवजा राशि तत्काल भुगतान करने की मांग की है। वही पूर्व में हुए आदिवासीयों ग्रामीणो के फर्जी इंकाउन्टर, ग्रामीणो को नक्सली, संगम सदस्य, नक्सली सहयोगी बनाकर अपराधी घोषित कर जेल भेजने की भी उच्च स्तरीय जुडिशियली मजिस्ट्रियल जांच करायें जाने की मांग की गई है। इस जांच दल में समाज के 10 सदस्य, जिसमें तीन आदिवासी जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक संगठनों के 7 प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित करने की मांग की जा रही है। इस आंदोलन के साथ आक्रोशित समुदाय के द्वारा पूर्व के गढे मुद्दे भी उखाडे है। जहां 06 मई 2016 को थाना मला. के पाथरी पुलिस चौकी अंतर्गत जगला ग्राम के दो बैगा आदिवासी पुरूष घनश्याम व मंशाराम सहित घनश्याम की 8 माह की गर्भवती पत्नि सौनी बाई को नक्सली के आरोप में गिरफ्तार करने का मामला भी उजागर किया तथा उन पर हत्या एवं आर्म्स एक्ट के तहत बने मामले को भी जांच का विषय बताया। वही पुलिस अभिरक्षा में उक्त महिला के बच्चे की मृत्यु होने के मामले की लंबित जांच को पूरा कर पीड़ितों को न्याय दिलाये जाने की मांग की गई। आदिवासी समुदाय ने उक्त सभी मांगों पर 15 दिवस के अंदर कार्रवाई कर दोषियों को सजा देने की बात कही है। अन्यथा आदिवासी समाज द्वारा उक्त घटना को लेकर राज्यव्यापी के साथ-साथ अंतर्राज्यीय आंदोलन करने की चेतावनी दी है।