डॉ.ब्रह्मदीप अलूने
कर्नाटक में कुमारस्वामी की बिदाई और भाजपा सरकार के बेमौसम अवतरण को लेकर बीजेपी के एक कार्यकर्ता ने बेहद दिलचस्प बात कही। उसने कहा कि “ये पावर पॉलिटिक्स का युग है। सरकार बनाने का दावा करने के फ़ैसले को आप किसी वैचारिक चश्मे से ना देखें। केंद्रीय नेतृत्व ने सरकार बनाने का फ़ैसला किया और वो (येदियुरप्पा) कर्नाटक में सबसे बड़े नेता हैं।"
दरअसल भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के प्रभावी राजनीतिक दल भी अब विचारधारा, नियमों, आदर्शों, मूल्यों से परे जाकर सत्ता के शीर्षासन पर अपनी गिद्ध दृष्टि बिठाये होते है और इसके बीच आने वाली हर दीवार को नष्ट कर दिए जाने में कोई बुराई भी नहीं समझी जाती। किसी भी स्तर की सत्ता पाने के लिए आंकड़ों को पूरा करने की कोशिशें सर्वोच्च स्तर से होती है और पार्टी के जिम्मेदार नेता उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने की चेष्टा करते है। अंततः सत्ता प्राप्ति को सियासी चातुर्य से जोड़ दिया जाता है और तरीके को दरकिनार कर दिया जाता है। येन केन सत्ता पाने का यह तरीका पंचायत चुनाव, नगरीय निकाय, विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा से लेकर राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में भी देखा जा सकता है।
भारतीय राजनीति आदर्शों और मूल्यों के उदाहरणों से भरी पड़ी है लेकिन यह अब दौर बदला है और खूब बदला है। समाजवादी लोकतांत्रिक भारत में जनता के बीच स्थानीय लोकप्रियता, ईमानदार नेताओं की स्वीकार्यता अब बीते दौर की कहानी हो गई है। हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में जनता से यह साफ कहा कि उनका एक एक मत किसी उम्मीदवार को नहीं मोदी को मिलेगा। वहीं अमित शाह ने तो स्थानीय उम्मीदवार के प्रति लोगो के गुस्से को भूल जाने की अपील करते हुए कहा कि आप मोदी जी को मत दे रहे है। इसका जबरदस्त असर हुआ और कई स्थानों पर विधानसभा चुनावों में हार जाने वाले नेता लोकसभा चुनावों में लाखों मतों से जीत गये। मोदी की लोकप्रियता इस दौर में स्वर्णिम इतिहास रच रही है लेकिन इसके साथ स्थानीय नेतृत्व के खत्म होने की शुरुआत भी हो गई है। इसका असर सभी दलों पर देखने को मिल रहा है और कई विपक्षी पार्टियों के बड़े नेता दल और विचारधारा से अलग भाजपा में प्रवेश कर गए है। जाहिर है भारत की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक पार्टियां सत्ता को प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जाने को यथार्थ और सत्य समझते है वहीं नेता भी अवसर का स्वागत करने में पीछे नहीं है।
पिछलें महीने जून में दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम में अचानक बदलाव आया और इसे भाजपा की विजय के तौर पर प्रदर्शित किया गया। तेलुगू देशम पार्टी के चार राज्यसभा सदस्यों सुजाना चौधरी,, सीएम रमेश, टीजी वेंकटेश और गरिकापति मोहनराव ने 20 जून को बीजेपी की सदस्यता हासिल कर ली। सदस्यता हासिल करने के बाद इन सांसदों ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से मुलाकात की। वेंकैया नायडू इस समय देश के उप राष्ट्रपति है और भाजपा के बड़े नेता रहे है। नायडु के साथ मुलाक़ात के दौरान इन सांसदों के साथ बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा मौजूद थे। उप राष्ट्रपति बनने के पहले वे दल बदल के मुखर विरोध में सार्वजनिक बयान दे चुके है। गौरतलब है कि 17 जून,2016 को एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि जब तक एक ऐसा क़ानून नहीं बनता जिसमें किसी व्यक्ति के एक दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल होने पर उसको पद से तत्काल अपदस्थ करने की व्यवस्था न हो तब तक लोकतंत्र चल नहीं सकता है। उन्होंने कहा था कि दलबदल के कारण लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है और मौजूदा दलबदल विरोधी क़ानून की समीक्षा की जानी चाहिए। नायडू ने जब ये बात कही थी तब वह केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हुआ करते थे। उन्होंने दल बदल कानून में सुधार करने की बात करते हुए सुझाव दिया था कि "पार्टियां ऐसे व्यवहार करती हैं, जैसे कि दलबदल विरोधी क़ानून सिर्फ़ एक व्यक्ति के पार्टी छोड़कर जाने पर लागू होता है और कई सांसदों के दूसरे दलों में जाने पर नहीं होता है। ऐसे में एक क़ानून होना चाहिए जो कि किसी एक चुनाव चिह्न से चुनाव जीतने के बाद दूसरी पार्टी में शामिल होने पर ऐसे नेता को दल बदलते ही उसके पद से हटा दे।“ ये बात और है कि दल बदल कर आने वाले टीडीपी नेता जब भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष के साथ उनसे मिल रहे थे तब नायडू साहब उन्हें सीख देना भूलकर मुस्कुरा रहे थे।
लोकसभा में पूर्ण बहुमत से आई सरकार को राज्यसभा में भी बहुमत हासिल हो जाए तो उसमें देश का वैधानिक ढांचा बदलने का माद्दा बढ़ जाता है। भाजपा की नजर राज्यसभा में पूर्ण बहुमत की और है। इन सबके बीच दल बदल कर आए नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के साथ मजबूरियां भी कमाल का असर डालती है।
आंध्रप्रदेश में भाजपा में शामिल हुए टीडीपी के राज्यसभा सांसद बेहद परेशानी के हालातों का सामना कर रहे थे। साल 2018 के अक्टूबर महीने में आयकर अधिकारियों ने टीडीपी के राज्यसभा सांसद सीएम रमेश के घर और कार्यालयों की तलाशी ली थी। वहीं साल 2018 के नवंबर महीने में प्रवर्तन निदेशालय ने सुजाना चौधरी के कार्यालयों पर छापा मारा था। तलाशी और छापें की कार्रवाई को इन दोनों सांसदों ने केंद्र की भाजपा सरकार की बदले के तौर पर बताया था। लेकिन अब ये दोनों ख़ुशी ख़ुशी भाजपा के हमराह बन गए है।
दक्षिण के एक दूसरे राज्य कर्नाटक में केंद्रीय नेतृत्व ने येदुरप्पा के साथ कमल खिला ही दिया जिसके प्रयास कई महीनों से किए जा रहे थे। सवा साल की कांग्रेस जेडीएस सरकार कुमारस्वामी के आंसुओं में डूबी रही और यही से भाजपा के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
225 सदस्यीय विधानसभा में विपक्षी बीजेपी को 107 विधायकों का समर्थन हासिल था वहीं कुमारस्वामी सरकार के पास विधानसभा में 117 विधायकों का समर्थन था जिसमें कांग्रेस के 78,जेडीएस के 37, बसपा के एक और एक मनोनीत विधायक शामिल थे। लोकसभा चुनावों में मोदी की वापसी का असर कर्नाटक में भी हुआ। राजनीतिक उठापटक के बाद कांग्रेस और जेडीएस के 20 बाग़ी विधायकों की बीजेपी में एंट्री की कवायद ने जोर पकड़ा। विश्वास मत और विश्वासघात साथ साथ हुआ। न्यायालय को भी बीच में आना पड़ा लेकिन 15 बाग़ी विधायक विश्वासमत के दौरान सदन में मौजूद नहीं रहे। कुमारस्वामी की अगुवाई वाली कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिर गई है। विश्वास मत के विरोध में 105 और पक्ष में 99 मत पड़े। अब भाजपा के येदुरप्पा कर्नाटक के मुखिया है।
साल 2017 में गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए और दोनों जगह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस सामने आई। इस समय वहां नजारा पूरी तरह से बदल गया है। 40 सीटों वाली गोवा विधानसभा में कांग्रेस को 17 और बीजेपी को 13 सीटें मिली थी। जबकि मणिपुर में बीजेपी को 21 और कांग्रेस को 28 सीटें मिली थी। गोवा में विधानसभा चुनावों के बाद राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भाजपा के मनोहर पर्रिकर को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया और बहुमत साबित करने के लिए उन्हें 15 दिन का वक्त दिया। भाजपा की सरकार बन गई। लेकिन इसके बाद राजनीतिक घटनाक्रम इस साल बदला जब मार्च में गोवा में कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और कहा कि भारतीय जनता पार्टी के विधायक फ्रांसिस डीसूज़ा के निधन के बाद राज्य में मनोहर पर्रिकर के नेतृत्व में चल रही सरकार ने विश्वास मत खो दिया है।
मार्च से जून आते आते कांग्रेस की स्थिति में आश्चर्यजनक बदलाव आया और गोवा के सीएम प्रमोद सावंत ने बाकायदा कांग्रेस के विपक्षी दल के नेता समेत 10 विधायकों के भाजपा में विलय की घोषणा कर दी। इस महीने गोवा में बीजेपी सरकार की कैबिनेट का विस्तार किया गया । इसमें कांग्रेस से आए तीन विधायकों को कैबिनेट में जगह दी गई है। विपक्ष के नेता रहे चंद्रकांत कावलेकर को डिप्टी सीएम बनाया गया है। इस समय गोवा में कांग्रेस की हालात बद से बदतर है और कांग्रेस के 10 विधायकों के पाला बदलने के बाद अब विधानसभा में उसके पास सिर्फ पांच विधायक बचे हैं।
पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में भाजपा की पहली बार सत्ता में ताजपोशी भी किसी सनसनीखेज सियासी घटनाक्रम की तरह नजर आती है। साल 2017 में मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए और राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से 28 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी वहीं भाजपा को 21 सीटें मिली थीं। बहुमत के लिए 31 सीटों की जरूरत थी। केंद्र में भाजपा के होने का लाभ राज्य में भी मिला और भाजपा ने 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में 32 विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने यहां राजभवन में आयोजित एक समारोह में बीरेन सिंह को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। मौका मिलते ही कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए टी. श्यामकुमार को भी मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। राज्य में 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद सबसे बड़े दल के रूप में उभरी कांग्रेस अब बद से बदतर स्थिति में पहुंच गई है। कांग्रेस के आठ विधायक बीजेपी में शामिल हो गए है और सदन में भाजपा के विधायकों की संख्या 21 से बढ़कर 29 हो गई।
दल बदल को लेकर मौजूदा कानून के मुताबिक किसी विधायी दल के दो तिहाई सदस्य अपनी मूल पार्टी से औपचारिक रुप से नाता तोड़ सकते हैं। गोवा में कांग्रेस के विधायकों ने बहुमत के खिलाफ जाकर सत्ता को चुराने की जुगत में इसे आजमाया वहीं तेलंगाना में इसी रास्ते पर चलकर कांग्रेस के विधायक सत्ताधारी टीआरएस से जा मिले।
हालांकि मध्य प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम में देश के वरिष्ठ नेताओं में शुमार कमलनाथ का अनुभव आंकड़ों के खेल को दिलचस्प बना गया। 230 विधानसभा सदस्यों वाले मध्य प्रदेश में भाजपा के 108 विधायकों के मुकाबलें कांग्रेस के पास 114 विधायक हैं, वही सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से उसका आकड़ा 121 पर पहुंचता है। कर्नाटक के घटनाक्रम के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरने की आशंका को बढ़ावा मिलने लगा तो सरकार ने सदन में आपराधिक क़ानून संशोधन विधेयक पर वोटिंग करवा कर अपने इरादें जाहिर कर दिए। वोटिंग में कमलनाथ सरकार को संख्या बल से ज्यादा मत मिले और बाद में भाजपा के दो विधायकों ने कांग्रेस का दामन भी थाम लिया।
बहरहाल मध्य प्रदेश के घटनाक्रम को छोड़ दिया जाए तो देश की राजनीति और नेता सत्ता के सोपान तय करने के लिए सब कुछ करने को तैयार है। अमित शाह की रणनीति में सफलता के लिए किसी भी साधन को आजमाने से गुरेज नहीं है,स्थितियां भी इसके लिए मुफीद है और दल बदल के इस दलदल में कमल खिलता जा रहा है।