प्रदेश में विधान परिषद गठन की योजना बीस साल पुरानी: मुख्यमंत्री
भोपाल
प्रदेश में विधान परिषद गठन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने आ गए हैं। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि सरकार अपने खास लोगों को सरकार में समायोजित करने के लिए यह कदम उठा रही है। इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्थिति साफ कर दी है। उन्होंंने आज मंटो हॉल में आयोजित स्टीम कॉन्क्लेव के बाद मीडिया से इस बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कोई नई सोच नहीं हैं। 20 साल से प्रदेश में इस पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विधान परिषद में लोग जुड़े, प्रतिनिधि बनें, ये अच्छा है। विपक्ष के सवालों पर जवाब देते उन्होंने कहा कि विपक्ष तो हर चीज का विरोध करता है ये उसका काम ही है।
बता दें विधान परिषद के गठन को लेकर कवायदें तेज हो गई हैं। मंगलवार को प्रदेश के मुख्य सचिव एस आर मोहंती ने अन्य विभाक के सचिवों व अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इस बैठक में विधान परिषद का प्रारुप कैसा रहेगा इस पर चर्चा की गई। कांग्रेस ने विधान सभा चुनाव में अपने वचनपत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद विधान परिषद का गठन किया जाएगा. पार्टी सत्ता में आयी और उसने अपने वादे के मुताबिक तैयारी शुरू कर दी. संसदीय कार्य विभाग ने कानूनी प्रावधानों के अनुसार इसका खाका बनाकर विधि विभाग से परीक्षण कराया था और संबंधित विभाग से राय भी मांगी थी। संसदीय कार्य विभाग ने परिषद पर होने वाले अनुमानित खर्च का खाका भी तैयार किया है। इसके अनुसार विधान परिषद में विधान परिषद सदस्य और अधिकारी-कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर ही सालाना करीब साढ़े 26 करोड़ रुपए खर्च होंगे। बाक़ी व्यवस्था पर सवा छह करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
कहां- कितना खर्च
- विधानसभा बजट का होगा विभाजन
- दीगर व्यय दौरों व आतिथ्य पर 85-85 लाख
- विधायक वेतन-भत्ते 27.5 करोड़ रु. 9.16 करोड़
- यात्रा भत्ता 9.5 करोड़ रु. 3.16 करोड़
- कार्यालय खर्च 2.35 करोड़ रु. 78 लाख रु.
- वेतन-भत्ते 70 करोड़ रु. 12 करोड़ रु.
- फर्नीचर, कम्प्यूटर पर 5 करोड़ रुपए,
- गाडिय़ों पर 1 करोड़
- टेलीफोन 25 लाख
- कुल सालाना व्यय 32.75 करोड़
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