हर साल बढ़ रहे खरपतवार व कीटनाशक के दाम,उपज का भाव वैसा नहीं
भोपाल। किसान अपने खेतों में बोवनी के बाद अंकुरित हुई फसल में उगे कचरे को नष्ट करने के लिए खरपतवारनाशक दवाओं का छिडक़ाव इन दिनों कर रहे हैं ताकि आने वाली फसल रोग मुक्त हो सके और कचरा नष्ट होने से फसल की अच्छी पैदावार हो सके। हालांकि उन पर आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है, इसका कारण साल दर साल दवाओं के दाम में मनमानी बढ़ोतरी है। पिछले साल की तुलना में इस साल खरपतवारनाशक में 200 से 500 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो गई है।
प्रदेश में बारिश होने के बाद किसान सभी जगह गांव-गांव में अपनी उड़द, सोयाबीन, धान आदि फसलों में खरपतवार नाशक और कीटनाशक दवाओं का छिडक़ाव कर रहे हैं। फसल के साथ खेतों में उगने वाली खरपतवार और कीटों से फसल को बचाने के लिए किसानों को समय-समय पर दवाओं का छिडक़ाव करना पड़ता है। किसानों को बड़ी मात्रा में खरपतवार और कीटनाशक खरीदनी पड़ती है लेकिन साल दर साल दवाओं की कीमत बढऩे से किसानों की चिंता बढ़ गई है। पिछले एक साल में खरपतवार और कीटनाशक दवाओं के दाम में वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर किसानों के बजट पर पड़ रहा है, बावजूद इसके जिम्मेदारों का इस ओर कोई ध्यान नहीं हैं। खरीफ सीजन में खेतों की खरपतवार नष्ट करने के लिए किसानों खरपतवार नाशक दवा का छिडक़ाव करना पड़ता है। एक साल पहले खरपतवार नाशक दवा 1300-1400 रुपए, कई कंपनियों की 2000-3000 रुपए प्रति लीटर तक मिलती थी। दवा बनाने वाली लगभग हर कंपनी ने इस साल कई प्रतिशत तक कीमत में वृद्धि कर दी है। अब यही दवा किसानों को 1400-1600 रुपए व 2000-3500 रुपये प्रति लीटर मिल रही है। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है। इसी तरह कीटनाशक दवाओं के मूल्य में भी वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर फसल के लागत मूल्य पर पड़ रहा है।
लागत बढ़ रही, उपज का भाव वैसा नहीं
किसान सुरेश पटेल, मोहन सिंह आदि का कहना है कि जिस तेजी से फसल का लागत मूल्य बढ़ रहा है उसके मुताबिक उपज के मूल्य में वृद्धि नहीं हो रही है। इसलिए खेती लाभ के बजाए नुकसान का धंधा बनती जा रही है। अधिकांश किसानों का कहना है कि सरकार में पक्ष हो या विपक्ष, सभी पेट्रोल, डीजल, सरोई गैस की बात करते हैं लेकिन देश की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृषि में बढ़ रही महंगाई पर किसी का ध्यान नहीं है। खाज, बीज, कृषि उपकरण के साथ खरपतवार और कीटनाशक दवाओं के मूल्य में वृद्धि के किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि कृषि वैज्ञानिक तो खेतों में रासायनिक दवाइयों का प्रयोग करने को हतोत्साहित करते हैं। बैलों के माध्यम से कुलपों, यांत्रिक विधि से खरपतवार नष्ट करने के तरीकों को कम करके आजकल रसायन के ऊपर निर्भरता बढ़ गई है, इसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आते हैं। किसान जैविक पद्धति, जैविक खेती बायो केमिकल नीम का तेल आदि का उपयोग करेें। कीटनाशकों की कीमत को लेकर कृषि मंत्रालय में मूल्य निर्धारण की समिति होती है, उसमें कृषि वैज्ञानिक, मार्केटिंग से जुड़े उच्च स्तर का जो तंत्र है वो भाव निर्धारित करता है। मनमाने तरीके से कीमत नहीं बढ़ाई जा सकती।
bhavtarini.com@gmail.com 
