कांग्रेस के लिए लोकसभा में खतरा न बन जाएं आस्तीन के सांप

कांग्रेस के लिए लोकसभा में खतरा न बन जाएं आस्तीन के सांप

अगर यही स्थिति रही तो लोकसभा चुनाव भी जायेगा कांग्रेस के पंजे से

प्रत्याशी अपनी जीत के लिये कम, दूसरे को हरवाने मे ले रहे थे ज्यादा रुचि

dhanajay tiwari रीवा, विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी पराजय की अब पोल खुलना शुरू हो गई है। रीवा से लेकर भोपाल तक एक ओर जहां प्रत्याशी एक दूसरे की शिकायतें करने में जुटे हुये हैं वहीं दूसरी ओर भितरघातियों की सूची भी भोपाल पहुंच चुकी है। मु यमंत्री कमलनाथ के पास फिलहाल वक्त ही नहीं है कि वे फिलहाल इस मसले को गंभीरता से लेते हुये सीधी कार्यवाही करें। लेकिन इतना अवश्य है कि भितरघातियों को जल्दी ही बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। फिलहाल भोपाल में कांग्रेस हाई कमान के पास अधिकांश वही लोग पद मांगने पहुंच रहे हैं जिनका रीवा में कांग्रेस के ही प्रत्याशियों को चुनाव हरवाने में बड़ा रोल रहा है। वहीं कांग्रेसियों के एक खेमे के निशाने पर तो राज्य सभा सांसद राजमणि पटेल भी आ गये हैं। अन्दर ही अन्दर कांग्रेस में आग लग चुकी है। हल्का धुंआ भी बाहर आ रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस में सिर फुटौब्बल की स्थिति बनेेगी। 28 नव बर के बाद कांग्रेस प्रत्याशी इस बात को लेकर सक्रिय थे कि कहीं उनके वोटों वाली इवीएम मशीन में गड़बड़ न कर दी जाये। 11 दिस बर को जब परिणाम निकले तो अधिकांश प्रत्याशी मुंह छिपाते हुये इंजीनियरिंग कालेज से बाहर निकल आये। भोपाल में सरकार बनती दिखी तो हाजिरी लगाने भोपाल पहुंच गये और लक्ष्य था कि यहां हारे तो क्या हुआ, वहां से पद मिल जायेगा। लेकिन वहां कांग्रेसियों को लट्ठम-लट्ठ देख कर पुन: वापस रीवा आ गये। अब हवा बना रहे हैं कि सरकार उनकी है पहले जैसा ही चलेगा। शहर में जो चर्चा है उसके अनुसार रीवा में कांग्रेस खासा हावी थी। भाजपा परेशान थी और वह किसी कीमत में जीत चाहती थी। लिहाजा उसने सबसे पहले तो कांग्रेस की कमजोर कडिय़ों को तोड़ा उसके बाद एक ऐसे दिग्गज को भी रातो-रात पलटाया जिसका रीवा में कुछ असर था। दिग्गज तो अपने को जीता माना बैठे थे लेकिन कहावत है कि गड्ढा खोदने वाला पहले ही गड्ढे में गिर जाता है, लिहाजा गड्ढा खोदने वाले प्रत्याशी खुद तीन फिट नीचे चले गये। कांग्रेस ने जिन्हें जिताऊ उ मीदवार मानकर विशेष विमान से उतारा था उन्हें अंत तक पार्टी के लोग ही नहीं पचा पाये। दूसरी तरफ उन्हेंं जीती पार्टी से हर तरह का स मान अन्दर ही अन्दर मिल रहा था। लिहाजा परसी टठिया को कौन छोड़ता। उनका मानना था कि अगर पैराशूट उ मीदवार जीते तो क्या होगा. उनकी भी बात में दम था कि अगर यह प्रचलन कांग्रेस में शुरू हो गया तो आगे भी अब दाल गलने वाली नहीं है। चुनाव के अंतिम दौर में जब स मान भी प्राप्त हो गया तो उन्होंने विमान को ही ब्लास्ट करने की ठान ली। धीरे-धीरे 48 घंटे के भीतर यह स्थिति हो गई कि आठो सीटें विंध्य के कैमोर पहाड़ की खाई में धंस गई। सब के सब हार गये, कोई दूसरे न बर पर था तो कोई तीसरे न बर पर। आज एक पुराने दावेदार कांग्रेसी से जब बात की गई तो उनका कहना था कि कांग्रेस का यही हश्र होना ही था। अगर यही क्रम चला तो अगली बार देवतालाब से जयवीर सिंह, मऊगंज से मृगेन्द्र सिंह, सेमरिया से पंकज सिंह का न बर कांग्रेस में लग जायेगा। कहां है अध्यक्षों का कुनबा आठों विधानसभा सीटों के बीच में कांग्रेस ने दस अध्यक्षों की जोड़ी बना रखी थी। एक शहर अध्यक्ष था तो उसके साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष, इसी प्रकार एक ग्रामीण अध्यक्ष था तो उनके साथ भी चार कार्यकारी अध्यक्ष। इनका चुनाव में रोल क्या रहा। कोई नहीं समझ पाया। ग्रामीण अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष तो प्रत्याशी भी रहे। लेकिन करारी हार के बावजूद भी पद से इतना मोह है कि वे उसकी भी नैतिक जि मेदारी लेते हुये नहीं छोड़ पा रहे हैं। हालांकि ये सभी अध्यक्ष भितरघातियों की सूची बना कर भेज रहे हैं लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि इनके खिलाफ भी आरोप लग रहे हैं। अब देखना होगा कांग्रेस में आस्तीन के सांप को विंध्य क्षेत्र के लिये यह कहना गलत होगा कि यहां भाजपा का किला मजबूत है और कांग्रेस का किला जर्जर। असली बात तो यह है कि कांग्रेस के मजबूत किले को कांग्रेस के नेता ही जर्जर बनाने में लगे हुये् हैं। कांग्रेस की गुटबाजी और हाई कमान की मनमानी कांग्रेस को दीमक की तरह चाट रही है। माहौल इस बार पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में था। हवा कांग्रेस के लिये बोल रही थी, पेड़ पौधे तक चिल्ला रहे थे। लेकिन राजेन्द्र शुक्ल ने उस हवा को रोकने के लिये जो चक्रव्यूह रचा वे उसमें पूरी तरह सफल रहे। खास बात यह थी कि कांग्रेस के पंजे की कमजोर उंगलियों को कमल के फूल में ऐसा चिपकाया कि पूरी पार्टी ही धराशायी भर नहीं हुई बल्कि जमीदोज हो गई। क्या मतलब निकला सर्वे का चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भी सर्वे कराया था। एक प्रत्याशी महोदय को सीधे तौर पर कहा गया था कि आप क्षेत्र बदल लो निकल जाओगे। लेकिन अडिय़ल व्यवहार के धनी नेता जी ने किसी की न सुनी। उनके चक्कर में दो सीटें चली गई। दो सीट इसलिये गवां दी कि कांग्रेस हाई कमान ने सतयुगी विमान से अचानक दो प्रत्याशी अवतरित कर दिये। सर्वे में किसी का नाम था, लगातार उनका प्रचार अभियान था लेकिन कांग्रेस ने अन्तत: कांग्रेस को ही निपटा दिया। अभी भी वे होश में आने की बजाय इसलिये मदहोश हैं कि अब तो सरकार उनकी है। सबने डेरा भोपाल में डाल रखा है कि हमारे नाथ तो हैं ही इसलिये नाथ के रहते हम खाली नहीं रहेंगे। कहां गये पलामू वाले चौबे जी चुनाव के दौरान पलामू वाले चौबे जी बड़े फेमस हो गये थे। होटल में दरबार और आने वाले दिनों में निगम मंडल अध्यक्षों उपाध्यक्षों की नियुक्ति कराने के दावे भी कर रहे थे। इनसे कई प्रत्याशी बहुत परेशान थे। दो प्रत्याशी तो खुल कर बोल रहे थे कि इनकी वजह से कई बार प्रचार में व्यवधान होता है। क्योंकि अगर प्रत्याशी का कहीं भाषण चल रहा है उसे बीच पैसे का रोना रोने लगते थे। उधर दिल्ली हाई कमान से भेजी गई संगठनात्मक टीम कार्यकर्ताओं को ऊर्जावान बनाने की बजाय रीवा के नेताओं के परेशानी का कारण बन गये थे। ऐसे में परिणाम की क्या आशा की जा सकती है। निशाने पर आये राजमणि पटेल कांग्रेस से राज्य सभा सांसद राजमणि पटेल इन दिनों अपनो के बीच ही घिरे हुये हैं। कांग्रेसियों का ग्रुप पूंछ रहा है कि हाई कमान ने उन्हें राज्य सभा सांसद तो बना दिया लेकिन वे कितने प्रतिशत पिछड़ों का वोट बढ़ा पाये। उन पर आरोप है कि वे अपने बेटे के लिये सिरमौर से टिकट मांग रहे थे। लेकिन अरुणा तिवारी को टिकट मिलने के बाद पटेल वोट बैंक भाजपा में ट्रान्सफर हो गया, कांग्रेस पराजित हो गई। एक आरोप यह भी लगा है कि श्री पटेल मनगवां से प्रीती वर्मा को टिकट दिलाना चाहते थे लेकिन नहीं दिला पाये, परिणाम स्वरूप वहां भी पटेल वोट बैंक खिसक गया। हाई कमान को भेजी गई जानकारी में बताया गया है कि श्री पटेल के गांव बरौं में खुद बसपा प्रत्याशी पकंज पटेल अन्य से आगे रहे।