गठबंधन की जोड़-तोड़: 2019 का चुनाव 2004 को दोहराएगा!
नई दिल्ली
यूपी, बिहार से लेकर तमिलनाडु और महाराष्ट्र में हाल के गठबंधन बड़ी पार्टियों की अंदरुनी हलचल और अनिश्चितता की ओर इशारा कर रहे हैं. उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों के तैयार हो रहे ताकतवर गठबंधन से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बीजेपी दक्षिणी राज्य तमिलनाडु और महाराष्ट्र में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन का दायरा मजबूत करने व कांग्रेस के नेतृत्व वाले बिखरे महागठबंधन के अलावा राज्यों की ताकतवर पार्टियों को साथ लाने की मशक्कत में जुट गई है. पार्टियों को पता है कि ज्यादा वोट से बड़ी जीत जरूरी है और बड़ी जीत गठबंधन में शामिल पार्टियों की संख्या पर निर्भर करेगी.
आंकड़े बताते हैं कि ज्यादा वोट पाना हमेशा सीट की गारंटी नहीं है और इस वोट परसेंटेज और सीट के समीकरण को गठबंधन की राजनीति किनारे कर देती है.
1999 से लेकर 20014 तक के चुनावों में मुख्यतौर पर तीन गठबंधन बने. वही गठबंधन सत्ता तक पहुंचा जिसने सबसे ज्यादा पार्टियों के साथ समझौता किया. 1999 में NDA ने 19 पार्टियों के साथ गठबंधन किया जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन 11 पार्टियों को लेकर चुनाव में उतरी थी. बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए ने सरकार बनाई. उसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के पास 1999 से 7 कम पार्टियां थीं, जबकि यूपीए 20 पार्टियों के गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरा. इस बार केंद्र में यूपीए ने सरकार बनाई.
2009 में भी यूपीए के पास एनडीए से दो पार्टियां अधिक थीं, ऊपर से मुलायम सिंह और बसपा ने बिना मांगे यूपीए सरकार का समर्थन कर दिया. तीसरा मोर्चा यानी थर्ड फ्रंट 2014 तक आते-आते बिखर गया. 2014 में फिर से एनडीए ने यूपीए के मुकाबले ज्यादा पार्टियों को जोड़ा. 2009 के मुकाबले 8 पार्टियों को गठबंधन में शामिल करते हुए 18 पार्टियों के साथ चुनाव लड़ते हुए 336 सीट जीतकर सरकार बनाई.
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