माता-पिता को कैद करने वाले बेटा-बहू को कोर्ट ने किया मकान से बेदखल

बिलासपुर
 बुजुर्ग माता-पिता को प्रताड़ित कर मकान के एक कोने में कैद करने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने पुत्र और बहू को मकान से बेदखल करने का आदेश दिया है। साथ ही दुर्ग के जिला न्यायाधीश को 30 दिन के अंदर बेदखली आदेश जारी कर रजिस्ट्री को सूचना देने के निर्देश दिए हैं।

याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त कर्मचारी प्रमोद रंनजनकर(87) और उनकी पत्नी कश्पिरा(77) भिलाई सेक्टर नौ स्थित अपने घर में रहते हैं। उनके साथ उनका बेटा पूर्व सैनिक और वर्तमान में इंडियन ऑयल कार्पोरेशन के कर्मचारी अरुणशंकर और शिक्षक बहू रिंकू कौर भी रहती है।

बेटे और बहू ने बुजुर्ग दंपती को प्रताड़ित कर घर के एक कोने में कैद कर दिया है। माता-पिता ने मामले की पुलिस में शिकायत की। वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा अधिनियम 2007 के तहत प्रकरण न्यायालय में पेश किया गया। प्रकरण के लंबित रहने के दौरान दंपती ने अंतरिम राहत के लिए जेएमएफसी कोर्ट में आवेदन दिया।

इसमें बेटा-बहू को उनके स्वामित्व के मकान से बेदखल करने की मांग की गई। मामला सिविल प्रकृति का होने के कारण जेएमएफसी ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ दंपती ने सत्र न्यायालय में अपील की। सत्र न्यायालय ने भी अपील खारिज कर दी। इस पर उन्होंने पूर्व न्यायाधीश व अधिवक्ता टीके झा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता वरिष्ठ नागरिक दंपती ने यातना, क्रूरता और दुर्व्यवहार किए जाने की शिकायत की थी। बेटा 60 हजार रुपए और बहू 20-25 हजार रुपए प्रतिमाह आय प्राप्त करने के बावजूद उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं। बहू मकान में ट्यूश्न पढ़ाती है।

पूरे मकान में कब्जा कर उन्हें एक कोने में कैद कर दिया गया है। मकान के जिस हिस्से में बुजुर्ग रहते हैं, वहां की पानी व बिजली सप्लाई भी बंद कर दी जाती है। होटल से खाना मंगाना पड़ा है। फिर भी इनके बेदखली आवेदन को खारिज कर दिया गया।

वरिष्ठ नागरिक अलग-अलग अदालत का सहारा नहीं ले सकते हैं। याचिका में जस्टिस गौतम भादुड़ी के कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने दुर्ग जिला न्यायाधीश को आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद 30 दिन के अंदर दंपती से क्रूरता करने वाले बेटे व बहू को मकान से बेदखल करने का आदेश देने और हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को सूचित करने के निर्देश दिए हैं।

प्रमुख सामाजिक चुनौती बन गई है वृद्धावस्था

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के जीवन व संपत्ति की सुरक्षा के लिए उपयुक्त कानून बनाया गया है। बुजुर्गों की देखभाल उनके परिवार द्वारा नहीं की जा रही है। नतीजन कई वृद्घ व्यक्ति अकेले रहने के लिए मजबूर है। वृद्धावस्था प्रमुख सामाजिक चुनौती बन गई है। वृद्ध व्यक्तियों की देखभाल व सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।