जब बोहरा धर्मगुरु को भेंट की थी गीता, तो उन्होंने भी दी थी इबादत करने वाली माला
इंदौर।
जिस वक्त देश अपने विकास के लिए नए आयाम रच रहा था, उस दौर में शहर में मजहबी सौहार्द की एक नई दास्तां लिखी जा रही थी। इतिहास के पीले पड़ चुके पन्नों पर 6 अप्रैल 1954 की तारीख न केवल दर्ज है बल्कि वर्तमान पीढ़ी उस वक्त की धरोहर को आज भी सहेजे हुए है। शहर के बड़ा रावला में उन दिन राजा राव निहालकरण मंडलोई (जमींदार) की मेजबानी में बोहरा समाज के 51वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन तउश और उनके पुत्र सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन तउश को जमींदार परिवार द्वारा गीता भेंट की गई। इस उपहार के बाद सैयदना ताहेर सैफुद्दीन तउश ने भी वह माला राव निहालकरण को भेंट की, जिससे वे इबादत किया करते थे। जूनी इंदौर के रावला दरबार हॉल में आज भी तस्वीर और माला मौजूद है।
रावले में हुई थी एक सभा : जमींदार परिवार के वंशज राव श्रीकांत मंडलोई (जमींदार) बताते हैं कि यह घटना उनके जन्म के पहले की है। मौजूद दस्तावेजों और पिता द्वारा दी गई जानकारियों के अनुसार इंदौर के विकास और व्यापार में बोहरा समाज का बड़ा योगदान रहा। उसके नजराने के रूप में मेरी परदादी राजमाता गजरादेवी और दादाजी राव राजा छत्रकरण मंडलोई ने गुजरात से आकर बसे बोहरा समाजजन को मस्जिद के लिए जमीन दी थी।
राजकीय दस्तावेजों में जमीन देने की तारीख '14 रोजे शुक्रवार मालवी संवत् 1301’ दर्ज है। रानीपुरा में मदरसा और मुसाफिरखाना के लिए भी जमीन दी गई थी। 1943 में जब मस्जिद के लिए और जगह की जरूरत हुई तो राव निहाल करण मंडलोई ने 40 बाय 25 फीट जमीन और दी। 1953 में जब सैयदना ताहेर सैफुद्दीन तउश बेटे सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन तउश के साथ इंदौर आए थे, तब वे बड़ा रावला भी गए थे।
त्रिवेणी घाट के पंडित को बुलाया था : श्रीकांत जमींदार बताते हैं कि उस वक्त जमींदार परिवार ने त्रिवेणी घाट उज्जैन के प्रमुख पुजारी आत्मीयनारायण व्यास को बुलाया। उन्होंने मंत्रोच्चार के बीच बोहरा समाज के धर्मगुरु को गीता भेंट की थी। यह उपहार पाकर सैयदना ने माला उतारकर मेरे पिता को भेंट की थी। धर्मगुरुओं को जिन कुर्सियों पर बैठाया गया था, वे आज भी रावला परिवार के दरबार में रखी हुई हैं। इस परंपरा को निभाते हुए इस बार भी शहर आ रहे बोहरा समाज के 53वें धर्मगुरु सैयदना आलीकदर मुफद्दल सैफुद्दीन मौला को रावला आने का निमंत्रण भेजा गया है।
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