क्या गुल खिलाएगा दिग्गी राजा का 'साध्वी' से दूसरी बार मुकाबला

क्या गुल खिलाएगा दिग्गी राजा का 'साध्वी' से दूसरी बार मुकाबला

दिग्विजय का माइक्रो मैनेजमेंट बनाम संघ और भाजपा की चौसर

दांव पर है भाजपा व संघ की प्रतिष्ठा

vinod upadhyay भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों राजनैतिक गर्मी से तप रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यहां दो संतों के बीच सत्ता संग्राम हो रहा है। एक हैं राजनीतिक संत दिग्विजय सिंह और दूसरी हैं धार्मिक संत साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर। करीब तीन दशक से भाजपा का गढ़ रहे भोपाल संसदीय सीट को जीतने के लिए कांग्र्रेस ने प्रदेश की राजनीतिक के चाणक्य दिग्विजय सिंह पर दांव खेला है तो भाजपा ने भगवाधारी साध्वी प्रज्ञा के सहारे उनका काउंटर करने की तैयारी की है। दो संतों के इस मुकाबले ने भोपाल सीट को देश की सबसे हॉट सीट बना दिया है। भोपाल संसदीय सीट देश की उन चुनिंदा सीटों में से है जिन पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुईं हैं। यहां पर भाजपा और कांग्रेस से ज्यादा दिग्विजय की निजी प्रतिष्ठा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन के बीच मुकाबला है। पूरी लड़ाई अब असल चुनावी मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत लड़ाई में तब्दील हो गई है। राजनैतिक कद के हिसाब से देखा जाए तो दिग्विजय के मुकाबले प्रज्ञा नई हैं, लेकिन वोटों के ध्रुवीकरण के जाल से वे कैसे निकलते हैं, यह देखना है। हालांकि अभी प्रचार में दिग्विजय आगे दिख रहे हैं। राजनीति में 'साध्वी से दिग्विजय सिंह का यह दूसरा मुकाबला है। पहली बार 2003 के विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा की ही साध्वी उमा भारती से था। तब दिग्विजय मुख्यमंत्री में थे। उस चुनाव में साध्वी उमा भारती ने उनकी दस साल की सरकार को उखाड़ फेंका था। तब दिग्विजय सिंह संत नहीं थे। अब 16 साल बाद एक बार फिर वे एक अन्य साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से मुकाबला कर रहे हैं। लेकिन इस बार दिग्विजय सिंह भी एक संत की तरह चुनाव लड़ रहे हैं। वे अब तक भोपाल संसदीय क्षेत्र के सभी बड़े मंदिरों की परिक्रमा कर चुके हैं। साथ ही रविवार से पद यात्रा भी शुरू कर दी है। ऐसे में संत बनाम संत का यह मुकाबला काफी रोचक हो गया है। प्रहलाद के बाद नर्मदा परिक्रमा करने वाले दूसरे नेता विपक्ष द्वारा हमेशा दिग्विजय सिंह को हिंदुत्व विरोधी प्रचारित किया जाता रहा है। लेकिन मप्र की जीवन रेखा और आध्यात्मिक नदी नर्मदा की पैदल परिक्रमा करने वाले दिग्विजय सिंह दूसरे नेता हैं। उनसे पहले भाजपा नेता प्रहलाद पटेल ने नर्मदा की पैदल परिक्रमा की थी। दिग्विजय सिंह ने अपनी पत्नी अमृता सिंह के साथ जिस शिद्दत के साथ मां नर्मदा की 3,100 किमी की परिक्रमा को 192 दिनों में पूरा किया उससे उन्होंने प्रदेश के जनमानस में यह भावना भर गई की दिग्विजय सिंह किसी संत से कम नहीं हैं। दिग्गी राजा की नर्मदा परिक्रमा का ही परिणाम था कि एक दशक से घर बैठे कांग्रेसी कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हुए और पार्टी 15 साल बाद सत्ता में वापसी कर सकी। अब यही संत इस बार अपनी प्रतिष्ठा बचाने मैदान में है। माइक्रो मैनेजमेंट बनाम संघ की चौसर भाजपा ने हमेशा से भोपाल सीट पर हिंदू कार्ड खेलने की रणनीति पर काम किया है। लेकिन इस बार दिग्विजय सिंह ने भाजपा के हथियार से ही उसे मात देने की रणनीति बनाई है। भाजपा प्रत्याशी घोषित होने से पहले ही उन्होंने मंदिरों में जाना शुरू कर दिया। साथ ही उन्होंने अपने माइक्रो मैनेजमेंट के सहारे अपनी चुनावी जमावट कर ली है। सिंह ने कमरा बैठक, मैन टू मैन चर्चा, बूथ मैनेजमेंट के सहारे पूरे संसदीय क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली है। उधर, दिग्विजय सिंह की जमावट को देखते हुए भाजपा और संघ ने भी अपनी चौसर बिछानी शुरू कर दी है। लेकिन भाजपा के कई स्थानीय नेताओं को साध्वी की उम्मीदवारी नहीं भा रही है, ऐसे में प्रज्ञा ठाकुर के लिए संघ अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है। साध्वी प्रज्ञा राजनीति में दिग्विजय सिंह जैसा बड़ा नाम नहीं है। इसलिए उनकी जीत या हार सीधे तौर पर भाजपा व संघ की ताकत से जुड़ी है। कांग्रेस में एकजुटता, भाजपा में विद्रोह भोपाल लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस जहां एकजुट नजर आ रही है, वहीं भाजपा में विद्रोह का नजारा है। इससे कांग्रेस को भाजपा के बागियों से फायदा होता दिख रहा है। यही नहीं अपने बेबाक बोलों के लिए मशहूर दिग्विजय, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर व उन पर लग चुके मालेगांव बम धमाकों के आरोपों को लेकर बेहद संयत है और इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। सिंह हर ऐसे कदम से बच रहे हैं जिससे चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए कोई जगह बने। अमृता ने भी संभाला मैदान दिग्विजय सिंह के लिए उनकी पत्नी अमृता राय ने भी मोर्चा संभाला हुआ है। इस सीट पर बड़ी संख्या में पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश-बिहार) के मतदाता है। अमृता खुद पूर्वांचल से होने से इन लोगों के साथ ज्यादा मजबूती से संपर्क कर रही हैं। प्रज्ञा के मुकाबले दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी काफी पहले घोषित होने से कांग्रेस को प्रचार व संपर्क में बढ़त मिली हुई है। भाजपा आखिरी दौर में पूरी ताकत झोंक रही है और रोड शो व सभाओं के जरिए अपने बड़े नेताओं को प्रचार में उतार रही है। साधु-संत भी जुटे प्रचार में भोपाल संसदीय सीट पर मुकाबला हिंदुत्व बनाम हिंदुत्व हो गया है। साधु-संतों का एक वर्ग प्रज्ञा तो एक वर्ग दिग्विजय के लिए प्रचार में जुटा हुआ है। भाजपा के समर्थन में देशभर से आईं करीब 700 साध्वियों ने मोर्चा संभाल रखा है। वहीं कांग्रेस के समर्थन में खुद कम्प्यूटर बाबा ने मोर्चा संभाल लिया है। आज से अगले 3 दिन तक 7 हजार साधु भोपाल आकर डेरा जमाएंगे। संतों का तप तीन दिन चलेगा। 7, 8 और 9 मई को सात हजार से ज़्यादा साधु संत धूनी रमाएंगे। वो साधना कर दिग्विजय सिंह की जीत की कामना करेंगे। इस जप और तप का समापन 9 मई को होगा जब पूरे भोपाल में ये संत समाज रोड-शो करता निकलेगा। भोपाल संघ के सामने गढ़ बचाने की चुनौती भाजपा के गढ़ भोपाल में दिग्विजय सिंह के कारण संघ के सामने गढ़ बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। इसके लिए संघ के स्वयंसेवकों ने मैदानी मोर्चा संभाल लिया है। वहीं संघ की निगरानी में भाजपा के चुनावी कार्यक्रम चल रहे हैं। संघ के पदाधिकारी प्रतिदिन दिन भर की गतिविधियों की समीक्षा कर अगले दिन की रणनीति बना रहे हैं। जातीय समीकरण के आधार पर रणनीति भोपाल लोकसभा सीट के जातीय समीकरण को देखा जाए तो यहां 20 से 25 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। भोपाल संसदीय सीट से अगला सांसद कौन होगा, यह मुस्लिम और ब्राह्मण वोट से तय होगा। भोपाल के 21 लाख मतदाताओं में 5 लाख मुस्लिम और 3.75 लाख ब्राह्मण वोट हैं। इन दोनों वर्गों को साधने के लिए भाजपा और कांग्रेस ने मैदानी जमावट की है। इस सीट पर ओबीसी वोटर्स 4 लाख, क्षत्रिय एक लाख 20 हजार, एससी-एसटी वोटर करीब 2 लाख और सिंधी वोटर्स की संख्या करीब 2.5 लाख है।