चक्रव्यूह में जयराम, पुराने नेताओं की हसरतें युवा सरकार पर हावी

चक्रव्यूह में जयराम, पुराने नेताओं की हसरतें युवा सरकार पर हावी

धड़ों में अब तक छिटकी रही हिमाचल प्रदेश की भाजपा, सत्ता के एक बरस पूरा होने पर भी सूबे के विकास को रफ्तार नहीं दे पाई है. इसी बीच लोकसभा चुनावों की दस्तक से पुराने नेताओं की राजनीतिक हसरतें राज्य सरकार के रास्ते कठिन बना रही हैं. पुराने नेता अपनी हवा बनाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा तो ले ही रहे हैं, नौकरशाहों के जुड़े पुराने तार भी गुल खिला रहे हैं.

भाजपा सरकार के पास गिनाने लायक कोई उपलब्धि नहीं है. दूसरी तरफ, पार्टी में जमीनी स्तर पर विधानसभा चुनावों के दौर की हनक गायब है. प्रदेश में करीब एक साल पहले लोगों ने भाजपा के नाम पर मुहर लगाई थी. तब चुनाव से पहले प्रेमकुमार धूमल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया गया था. तब यह तक तय किया जा रहा था कि धूमल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की टीम में कौन होगा. किसी को आभास भी नहीं था कि धूमल खुद और पार्टी अध्यक्ष सत्तपाल सत्ती भी चुनाव हार जाएंगे. लेकिन जयराम ठाकुर के शपथ ग्रहण में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और समूचे केंद्रीय मंत्रिमंडल के पहुंचने से विद्यार्थी परिषद वाली भाजपा की नई टीम सत्ता पर काबिज हो गई और शायद यही बात पुराने लोगों की टीस की वजह बन गई.

 

सरकार बनने के नौ महीने के बाद बोर्डों और निगमों में जो नियुक्तियां की गईं, उनमें भी खासा बवाल मचा रहा. मुख्यमंत्री ने इसमें अपनी मर्जी चलाते हुए कड़े फैसले लिए जिसने कई लोगों को नाराज कर दिया.

असल में, हिमाचल में विधानसभा चुनावों से पहले जीत के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं से कई वादे किए गए थे पर सत्ता प्राप्ति के बाद वे पूरे नहीं हुए. यही नहीं, खुद कार्यकर्ता भी पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा केगुटों में बंटे थे. कुछ संघ की टोली के थे तो कुछ को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से ताल्लुक का भरोसा था. इसी खींचतान में उलझी सरकार को फैसलों पर माथापच्ची करनी पड़ी.

अब जब हाइकमान की हरी झंडी मिलने पर मुख्यमंत्री ने हारे हुए नेताओं को भी सरकार में जगह दे दी तब बवाल शुरू हो गया. पुराने कद्दावर नेताओं के समर्थकों को तरजीह ना मिलने से सोशल मीडिया में युद्ध तेज हो गया. खुद मुख्यमंत्री के ओएसडी शिशु धर्मा पर एक महिला के साथ अभद्र व्यवहार करने के आरोप सुर्खियों में रहे. लेकिन तमाम विरोध के बावजूद, शिशु धर्मा के समर्थन में संगठन के बजाए खुद मुख्यमंत्री को खड़ा होना पड़ा.

राज्य में जयराम ठाकुर की सरकार बनने के बाद ही चार महत्वपूर्ण तैनातियां मुख्यमंत्री कार्यालय में हुईं. इसमें एबीवीपी और संघ पृष्ठभूमि से जुड़े लोग नियुक्त किए  गए. बाद में इनका विरोध होने लगा. सरकार की सारी ऊर्जा इन सबसे निपटने में खर्च हो गई. रही-सही कसर नौकरशाहों ने पूरी कर दी. बढिय़ा महकमे हासिल करने की जुगत में लगे नौकरशाह नतीजे देने के बजाए आपसी खींचतान में उलझे रहे. इनमें अधिकतर वे अफसर थे जो या तो पुरानी कांग्रेस सरकार अथवा प्रेम कुमार धूमल या जे.पी. नड्डा से जुड़े थे. लिहाजा नौकरशाही भी गुटों में बंटकर काम कर रही थी.
ग्यारह महीनों में अपनी हसरतें परवान चढ़ाने के लिए विभिन्न धड़े सरकार पर चौतरफा दबाव बनाते रहे. अब शांता कुमार कांगड़ा से तो प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर हमीरपुर से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं. वहीं मंडी सीट पर कमजोर भाजपा उम्मीदवार के चलते पार्टी विकल्प ढूंढ रही है. इस बीच जयराम ठाकुर की कांग्रेस के वीरभद्र सिंह और उनके परिवार से बढ़ रही नजदीकियां भी चर्चा में हैं. गौरतलब है कि मंडी से वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी सांसद रह चुकी हैं.

हालांकि लोकसभा चुनाव अब सिर पर हैं और मुख्यमंत्री केंद्र से सूबे के लिए परियोजनाओं के रूप में काफी मदद ला चुके हैं. लेकिन ब्यूरोक्रेसी नतीजे नहीं दे पा रही. योजनाएं बन नहीं रहीं या ऐसी बन रही हैं जो चालू होते ही फिसड्डी हो गईं. पर्यटन को बढ़ावा देने वाली हैली टैक्सी इसकी बदतरीन मिसाल है. प्रधानमंत्री ने सस्ती उड़ान की शुरूआत शिमला में की, उसी की हालत खस्ता है.
उधर आपस में उलझे और गुटों में बंटे भाजपाई मंत्री छोटे-छोटे झगड़ों में भी आग उगल रहे हैं. जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों में बने मंत्री नतीजे नही दे पा रहे हैं. हालांकि मुख्यमंत्री ने इन्हें सुधार लाने की चेतावनी दी है लेकिन असर होता नहीं दिख रहा है.

कुल मिलाकर मुख्यमंत्री मोर्चे पर अकेले डटे हैं और अकेले ही रूठों को मनाने में लगे हैं. नर्ममिज़ाज जयराम भले ही विधानसभाओं के दौरे कर रहे हों लेकिन दफ्तर से प्रदेश के कामकाज पर निगाह दूर तक नहीं जा पा रही. बेकाबू नेताओं और बिदके अफसरों पर अभी सख्ती नहीं की गई तो आने वाला समय चुनौतियों से भरपूर होगा.