बीजेपी ने इस वजह से नरोत्तम मिश्रा को सौंपी उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी

बीजेपी ने इस वजह से नरोत्तम मिश्रा को सौंपी उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी

भोपाल 
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव की तैयारी जोर-शोर से शुरू कर दी है. बुधवार को पार्टी ने प्रदेश प्रभारियों की नियुक्ति कर दी. इन प्रभारियों में एक नाम मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा का भी है. उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं.

लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से 80 सीटों वाला उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, जिसने यूपी जीत लिया उसके लिए सत्ता तक पहुंचने की राह आसान हो जाती है. सत्ता में आने के लिए सीटों की संख्या के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश पर सभी पार्टियों की नज़र रहती है.

तीन राज्यों में हार के बाद अब बीजेपी लोकसभा चुनाव में बाज़ी नहीं हारना चाहती. इसी को ध्यान में रखकर उसने चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. उसने राज्यों के लिए प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं. इनमें यूपी सबसे महत्वपूर्ण है. यूपी के लिए पार्टी ने तीन प्रभारी नियुक्त किए हैं. उनमें से एक नाम मध्य प्रदेश के कद्दावर बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा का है. वे शिवराज कैबिनेट में लगातार मंत्री रहे हैं.

यूपी जैसे राज्य के लिए नरोत्तम को चुना जाना अपने आप में महत्वपूर्ण है. उन पर विश्वास करने की वजह यह मानी जा रही है कि वे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. पार्टी अध्यक्ष के करीबी होने का उन्हें फायदा मिला है. दूसरा बड़ा कारण उनका ब्राह्मण होना है. बीजेपी की नज़र यूपी के ब्राह्मण वोटों पर है. जातिगत समीकरण समझने और फिर उन्हें साधने के लिए ब्राह्मण नेता का होना ज़रूरी है.

भाजपा को सपा तथा बसपा के संभावित गठबंधन से कठिन चुनौती मिलने के आसार हैं. यही वजह है कि ब्राह्मण वोटरों को साधने में नरोत्तम मिश्रा की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. नरोत्तम मिश्रा दतिया से विधायक हैं. अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने 1977-78 में छात्र जीवन से की. 1978-80 में भाजपा युवा मोर्चा की प्रांतीय कार्यकारिणी के सदस्य बने.

2005 में मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के मंत्रिमंडल में उन्हें राज्यमंत्री का पद मिला. उसके बाद वे शिवराज सिंह मंत्रिमंडल में मंत्री बनाए गए और उसके बाद 15 साल तक लगातार कैबिनेट मंत्री रहे. 2013 के चुनाव में पेड न्यूज मामले में उनके खिलाफ हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिल गई.