आजाद होगी पंजाब के किसानों की 21 हजार एकड़ जमीन! भारत-पाक सीमा पर कंटीली बाड़ शिफ्ट करेगी सरकार
केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम, ब्लूप्रिंट तैयार
1980 के दशक के अंत से सुरक्षा और ब्यूरोक्रेसी के चक्रव्यूह में फंसी
नई दिल्ली, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में पिछले चार दशकों से अपनी ही जमीन पर 'कैदियों' की तरह खेती करने वाले हजारों किसानों के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगी कंटीली बाड़ को 'जीरो लाइन' (वास्तविक सीमा) की ओर खिसकाने की संभावनाओं पर केंद्र ने एक नया और निर्णायक जोर दिया है। इसके तहत जिला प्रशासनों को एक विस्तृत 'सोशल इम्पैक्ट सर्वे' (सामाजिक प्रभाव सर्वेक्षण) करने का जिम्मा सौंपा गया है। यह सर्वे तय करेगा कि बाड़ को पीछे हटाने से सरहदी किसानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कितना सुधार आएगा।
यह फैसला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन 220 गांवों के हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जिनकी उपजाऊ जमीनें 1980 के दशक के अंत से सुरक्षा और ब्यूरोक्रेसी के चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं।
पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में पिछले चार दशकों से अपनी ही जमीन पर 'कैदियों' की तरह खेती करने वाले हजारों किसानों के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगी कंटीली बाड़ को 'जीरो लाइन' (वास्तविक सीमा) की ओर खिसकाने की संभावनाओं पर केंद्र ने एक नया और निर्णायक जोर दिया है। इसके तहत जिला प्रशासनों को एक विस्तृत 'सोशल इम्पैक्ट सर्वे' (सामाजिक प्रभाव सर्वेक्षण) करने का जिम्मा सौंपा गया है। यह सर्वे तय करेगा कि बाड़ को पीछे हटाने से सरहदी किसानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कितना सुधार आएगा।
यह फैसला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन 220 गांवों के हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जिनकी उपजाऊ जमीनें 1980 के दशक के अंत से सुरक्षा और ब्यूरोक्रेसी के चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं।
आतंकवाद के दौर की विरासत: क्यों अंदर लगी थी बाड़?
पंजाब में भारत-पाक सीमा की कुल लंबाई 553 किलोमीटर है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में जब पंजाब उग्रवाद के कठिन दौर से गुजर रहा था, तब घुसपैठ और हथियारों की तस्करी रोकने के लिए सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। उस समय की सुरक्षा स्थितियों और रणनीतिक जरूरतों को देखते हुए, यह बाड़ 'जीरो लाइन' पर न लगाकर भारतीय क्षेत्र के काफी अंदर लगाई गई थी।
कुछ संवेदनशील और भौगोलिक रूप से कठिन इलाकों में यह बाड़ वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा से 3 किलोमीटर तक अंदर है। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत की हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन बाड़ और वास्तविक सीमा के बीच 'नो मैन्स लैंड' जैसी स्थिति में चली गई। तकनीकी रूप से जमीन किसानों की ही रही, लेकिन उस पर उनका नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया।
21,600 एकड़ का गणित: 6 जिलों के 220 गांवों का दर्द
सीमा पर बाड़ के पार फंसी जमीन का दायरा बहुत बड़ा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पंजाब के छह सीमावर्ती जिलों— अमृतसर, तरनतारन, गुरदासपुर, पठानकोट, फिरोजपुर और फाजिल्का में लगभग 21,600 एकड़ जमीन इस श्रेणी में आती है।
अमृतसर: अकेले इस जिले की 3,801 एकड़ जमीन बाड़ के पार है।
प्रभावित गांव: लगभग 220 गांवों के किसान दशकों से इस समस्या को झेल रहे हैं।
किसानों की संख्या: हजारों किसान परिवार ऐसे हैं जिनकी आजीविका का मुख्य स्रोत बाड़ के उस पार स्थित उनकी पुश्तैनी जमीन है।
बाड़ ने न केवल जमीन को विभाजित किया, बल्कि किसानों के सपनों और उनकी आर्थिक प्रगति को भी सीमाओं में बांध दिया।
सुरक्षा की बेड़ियां: 10 से 4 बजे के बीच सिमटी जिंदगी
बाड़ के उस पार खेती करना किसी सजा से कम नहीं है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कड़ी निगरानी के बीच किसानों को अपनी ही जमीन पर काम करने के लिए सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है।
समय की पाबंदी: बाड़ के गेट खुलने का समय सीमित होता है। आमतौर पर किसानों को सुबह 10 बजे प्रवेश मिलता है और शाम 4 बजे तक वापस आना अनिवार्य होता है।
सुरक्षा जांच का बोझ: हर दिन गेट पर लंबी कतारें लगती हैं। किसानों की सघन तलाशी ली जाती है, उनके औजारों और पशुओं की जांच होती है। अटारी के पास होशियारनगर के किसान अर्जन सिंह बताते हैं कि दिन के कम से कम दो घंटे तो केवल चेकिंग और कागजी कार्रवाई में ही निकल जाते हैं।
मौसम की मार: सर्दियों में कोहरे के कारण दृश्यता कम होने पर गेट कई दिनों तक बंद रहते हैं। ऐसे में तैयार फसल की कटाई या सिंचाई न हो पाने के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ता किसान: क्यों कम है पैदावार?
बाड़ के पार खेती करना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रहा है। तरनतारन जिले के किसान रंजीत सिंह के अनुसार, बाड़ के उस पार की 8 एकड़ जमीन से होने वाली पैदावार बाड़ के इस तरफ की 5 एकड़ जमीन से भी कम है। इसके पीछे कई कारण हैं:
सिंचाई की समस्या: बाड़ के पार बिजली का कनेक्शन ले जाना नामुमकिन है। नए ट्यूबवेल लगाने के लिए रक्षा मंत्रालय से विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है, जो शायद ही कभी मिलती है। किसान पूरी तरह मानसून या डीजल पंपों पर निर्भर हैं।
मजदूरी का संकट: सुरक्षा प्रोटोकॉल और सीमित घंटों के कारण मजदूर बाड़ के पार जाने से कतराते हैं। यदि कोई तैयार होता भी है, तो वह सामान्य से दोगुनी मजदूरी मांगता है।
मशीनरी का अभाव: कंबाइन हार्वेस्टर और बड़े ट्रैक्टरों को बाड़ के पार ले जाना एक बड़ी चुनौती है। कई बार गेट की चौड़ाई कम होने या सुरक्षा अलर्ट के कारण मशीनें समय पर नहीं पहुंच पातीं।
बाजार से कटी जमीन: कौड़ियों के भाव बिकती विरासत
सुरक्षा प्रतिबंधों ने इन जमीनों की बाजार कीमत को भी ध्वस्त कर दिया है। बाड़ के पार स्थित जमीन का कोई खरीदार नहीं मिलता। यदि कोई किसान मजबूरी में अपनी जमीन बेचना चाहे, तो उसे मुख्य क्षेत्र की जमीन के मुकाबले आधी कीमत भी नहीं मिलती। बैंक भी इन जमीनों पर लोन देने में हिचकिचाते हैं, जिससे किसान कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है।
सीमावर्ती क्षेत्रों के युवाओं का मोह अब खेती से भंग हो रहा है, क्योंकि वे देख रहे हैं कि उनके पूर्वजों ने जिस जमीन के लिए संघर्ष किया, वह अब केवल बोझ बनकर रह गई है।
SIA करने का निर्देश देना एक बड़ी नीतिगत तब्दीली का संकेत
केंद्र सरकार द्वारा अब जिला प्रशासनों को 'सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट' (SIA) करने का निर्देश देना एक बड़ी नीतिगत तब्दीली का संकेत है। इस सर्वे में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:
बाड़ शिफ्ट होने से किसानों की आय में कितनी प्रतिशत वृद्धि की संभावना है।
अतिरिक्त भूमि के उपयोग से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
क्या बाड़ को जीरो लाइन के करीब ले जाने से सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे (जैसे सड़क और बीओपी) को मजबूत किया जा सकता है। स्थानीय निवासियों की वर्षों पुरानी शिकायतों का निवारण कैसे किया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जमीन सुचारू रूप से खेती के लिए उपलब्ध हो जाती है, तो पंजाब की कृषि जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
रक्षा रणनीति बनाम किसानों का हक: बीच का रास्ता
बीएसएफ के अधिकारियों का तर्क रहा है कि बाड़ को पूरी तरह से जीरो लाइन पर लगाना हमेशा सामरिक रूप से सही नहीं होता। भौगोलिक बनावट, नदियों का बहाव और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कुछ दूरी जरूरी होती है। हालांकि, आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन, सेंसर और स्मार्ट फेंसिंग के आने के बाद अब बाड़ को पीछे हटाना मुमकिन है।
सरकार अब उस 'मिडल ग्राउंड' की तलाश में है जहां सुरक्षा से समझौता किए बिना बाड़ को अधिकतम संभव दूरी तक पीछे धकेला जा सके। जहां बाड़ और जीरो लाइन के बीच की दूरी बहुत अधिक है, वहां इसे कम करने से सुरक्षा बलों को भी बेहतर पेट्रोलिंग में मदद मिलेगी।
bhavtarini.com@gmail.com

