रिवर फ्रंट घोटाला: CBI छापे से अफसरों में खलबली

रिवर फ्रंट घोटाला: CBI छापे से अफसरों में खलबली

लखनऊ

सीबीआई ने लखनऊ में गोमती नदी के किनारे बनाए जा रहे रिवर फ्रंट में 407 करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले का खुलासा करते हुए सोमवार को तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में सिंचाई विभाग के बड़े इंजीनियरों, ठेकेदारों और कर्मचारियों के 42 ठिकानों पर छापे मारे। घोटाले से अफसरों में खलबली मची रही। इस दौरान सीबीआई ने घोटालों से जुड़े दस्तावेज बरामद किए हैं। जांच एजेंसी ने लखनऊ के इंदिरानगर, गोमतीनगर, विकासनगर, राजाजीपुरम में रहने वाले इंजीनियरों और फर्म के ठेकेदारों के आवास समेत 25 ठिकानों पर छानबीन की। उत्तर प्रदेश के 13 शहरों लखनऊ, सीतापुर, रायबरेली, गाजियाबाद, नोएडा, अलीगढ़, गोरखपुर, आगरा, बुलंदशहर, एटा, मुरादाबाद, मेरठ और इटावा के अलावा राजस्थान के अलवर और पश्चिम बंगाल के कोलकाता में छापेमारी की गई।

 

189 इंजीनियरों और ठेकेदारों के खिलाफ दूसरी एफआईआई दर्ज

समाजवादी पार्टी सरकार में वर्ष 2014 से 2017 तक बनाए गोमती रिवर फ्रंट में घोटाले की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार बनने के बाद ही सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। इस मामले में सीबीआई ने 16 इंजीनियरों समेत 189 फर्म के मालिक ठेकेदारों को नामजद करते हुए दूसरी एफआईआर दर्ज की है। सीबीआई के अधिकारियों ने बताया कि प्रदेश सरकार ने 17 जुलाई 2017 को रिवर फ्रंट घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपी थी। इस आधार पर सीबीआई ने प्रारंभिक जांच 30 नवंबर 2017 को शुरू की। इस मामले में खुलासा हुआ कि रिवर फ्रंट के काम टेंडर के जरिये कराए जाने के बजाये सिंचाई विभाग की सात इकाइयों के अधीक्षण अभियंताओं, मुख्य अभियंताओं और सहायक अभियंताओं ने ठेकेदारों से मिलीभगत कर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया। टेंडर पर काम न देने से विभाग को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। काम नियमों को ताक पर रखकर वर्कआर्डर के आधार पर दे दिए गए।

 

ऐसे किया गया फर्जीवाड़ा

सिंचाई विभाग में अधीक्षण अभियंता, मुख्य अभियंता और सहायक अभियंता द्वारा कितने रुपये के काम कराए जाएंगे, इसकी धनराशि की सीमा तय है। साथ ही नियम है कि 10 लाख रुपये से ज्यादा के सभी काम टेंडर के जरिये कराए जाएं। सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने इससे बचने के लिए टेंडर छापने का ही फर्जीवाड़ा कर डाला। नकली अखबार छाप कर उसमें विभाग के टेंडर प्रकाशित कराने के फर्जी दस्तावेज बनाए गए। यही नहीं, इसे तत्कालीन सरकार में सूचना विभाग समेत सभी शासन के अन्य अधिकारियों को भेज दिया गया। इससे कोई प्रतियोगी टेंडर में भाग नहीं ले सका। अधिकारियों ने फर्जी टेंडर पेपर तैयार कराए और चहेते ठेकेदारों को काम देने के लिए उनकी बिड में एल-वन एवं एल-टू ठेकेदारों के रूप में खुद ही फर्जी दस्तावेज तैयार कर दिए। सीबीआई को प्रमाण मिले हैं कि खुद ही इंजीनियरों ने अपने हस्ताक्षर से यह फर्जी दस्तावेज तैयार करवा दिए। इससे किसी अन्य ठेकेदार को काम का मौका नहीं मिला।

 

काम आधा लेकिन रकम पूरी खर्च

सीबीआई ने पाया कि परियोजना की कुल लागत 1513 करोड़ रुपये में से 1437 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए लेकिन काम सिर्फ 40 फीसदी ही हुआ। सीबीआई को सुबूत मिले हैं कि चहेती फर्मों को ऊंचे दामों पर सप्लाई का काम दे दिया गया। चूंकि टेंडर में दिखाए गए अन्य प्रतिभागी फर्जी थे, लिहाजा मिलीभगत-साठगांठ और कूटरचना कर चहेतों को करोड़ों रुपये का लाभ दे दिया गया। सीबीआई ने पाया कि 407 करोड़ रुपये का अनावश्यक लाभ चहेतों को पहुंचाया गया। सिंचाई विभाग के इंजीनियरों ने कुल 673 वर्क एग्रीमेंट से काम कराए। जिसमें कोटेशन लेकर 115 काम कराए गए। इनमें से करीब 30 ऐसे टेंडर छापे गए जो फर्जी थे, यानी इसमें खुद ही गलत तरीके से अखबार छापने के बाद खुद ही प्रतिभागी तैयार कर काम हासिल कर लिया गया।

 

फ्रांस से बिना अनुमति के मंगवा लिया महंगा फव्वारा

सीबीआई ने जांच में पाया कि अधीक्षण अभियंता रूप सिंह यादव और एसएन शर्मा ने मिलीभगत कर खुद ही फ्रांस की कंपनी को म्यूजिकल फव्वारा लगाने का काम दे दिया। चीफ इंजीनियर अखिल रमन, अधीक्षण अभियंता एसएन शर्मा और रूप सिंह यादव ने बिना किसी अधिकार के अपने पद का दुरुपयोग किया। रूप सिंह ने सीधे फ्रांस की कंपनी मेसर्स एक्वाटिक शो को पत्र लिख दिया और उन्हें टेंडर में हिस्सा लेने के लिए लखनऊ बुलाया। इस टेंडर में भी लोएस्ट-वन आदि को लेकर कोई निविदा प्रकाशित नहीं की गई। उन्हें महज़ कोटेशन के आधार पर काम दे दिया गया। नियमत: इसे शासन स्तर पर टेंडर निकाल कर खरीद की जानी चाहिए थी, ताकि अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी टेंडर में हिस्सा ले पातीं।

 

कब-कब क्या क्या हुआ

गोमती रिवर फ्रंट परियोजना समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था।

यह प्रोजेक्ट 1513 करोड़ रुपये का था, जिसमें से 1437 करोड़ रुपये खर्च हो जाने के बाद भी 40 प्रतिशत काम पूरा नहीं हो सका।

आरोप यह भी है कि जिस कंपनी को इस काम का ठेका दिया गया था, वह पहले से काली सूची में दर्ज थी।

वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद इस प्रोजेक्ट में घोटाले की बात सामने आई।

तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर ने प्रोजेक्ट में गड़बड़ी का संदेह व्यक्त करते हुए इसकी वृहद जांच की अनुशंसा की थी।

इस पर सरकार ने न्यायिक जांच बैठा दी थी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई।

इस समिति ने जांच में दोषी पाए गए इंजीनियरों और अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की संस्तुति की थी।

इसके बाद 19 जून 2017 को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता डा. अंबुज द्विवेदी ने गोमतीनगर थाने में धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था।

बाद में इस प्रोजेक्ट में हुई गड़बड़ियों की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी गई।

सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच ने सिंचाई विभाग की ओर से गोमतीनगर थाने में दर्ज मुकदमे को आधार बनाकर 30 नवंबर 2017 को नया मुकदमा दर्ज किया।

सीबीआई अब उन आरोपों की जांच कर रही है कि प्रोजेक्ट के कार्य पूर्ण कराए बगैर ही स्वीकृत बजट की 95 प्रतिशत धनराशि कैसे खर्च हो गई?

प्रारंभिक जांच के अनुसार, प्रोजेक्ट में मनमाने तरीके से खर्च दिखाकर सरकारी धन की बंदरबांट हुई है।

प्रारम्भिक जांच के आधार पर सीबीआई ने 20 नवम्बर 2020 को इसमें मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग के तत्कालीन मुख्य अभियन्ता रूप सिंह यादव व वरिष्ठ सहायक राम कुमार यादव को गिरफ्तार कर लिया था। इस केस में यह पहली गिरफ्तारी थी।

गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से आधे से अधिक अभियन्ता सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

पूर्व में सीबीआई जांच में सिंचाई विभाग की ओर से पूरा सहयोग नहीं किए जाने का भी आरोप लगा था।

इस आधार पर शासन की ओर से विभाग को पूरा सहयोग करने के निर्देश दिए गए।  

बावजूद इसके बीते तीन सालों से शासन की ओर से बार-बार लिखा जा रहा है कि जो अधिकारी-कर्मचारी गोमती रिवर पफ्रंट के कार्यों से जुड़े रहे हैं उन्हें अन्यत्र सम्बद्ध किया जाए लेकिन विभाग की ओर से इस बारे में अब तक कोई कार्ररवाई नहीं की गई।