rajesh dwivedi
सतना। विभिन्न राजनैतिक दलों की आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच एक सवाल अहम बना हुआ है कि आखिर इस मर्तबा नागौद विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी किस नेता पर दांव लगाकर कांग्रेस से यह सीट छीनेगी? भाजपा के लिए अहम सीट मानी जाने वाली नागौद विधानसभा सीट को भाजपा ने तत्कालीन विधायक व मंत्री नागेंद्र सिंह की निष्क्रियता के चलते खो दिया था। उस दौर मे नागेंद्र सिंह की निष्क्रियता व उदासीनता ने कार्यकर्ताओं को भाजपा से दूर कर दिया था, जिसके चलते संगठन ने उनकी टिकट काट दी थी। हालांकि नागेंद्र सिंह को इसके बाद खजुराहो से लोकसभा सीट पर लड़ाया गया और मोदी मैजिक के चलते वे लोकसभा के गलियारों तक पहुंचाने में कामयाब तो हुए लेकिन उस दौरान नागौद में कांग्रेस के लिए वे ऐसी उर्वरक राजैनितक जमीन तैयार कर गए जिस जमीन पर कांग्रेस की राजनैतिक फसल लहलहा उठी और यादवेंद्र सिंह कांग्रेस की टिकट पर जनमानस द्वारा विधायक चुन लिए गए। अब एक बार पुन: चुनाव का मौसम आया है , ऐसे में जन मानस के बीच यह सवाल कौंधने लगा है कि इस मर्तबा आखिर भाजपा किस नेता पर दांव लगाकर पुन: नागौद सीट पर कब्जा जमाएगी।
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टिकट के लिए दो के बीच मुख्य मुकाबला
संगठन से जुड़े विश्वस्त सूत्रों की मानें तो नागौद विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की टिकट के लिए मुख्यत: दो लोगों में ही मुकाबला हो सकता है। संगठनात्मक स्तर पर देखा जाय तो गगनेंद्र सिंह को वर्ष 2014 के बाद स्थानीय भाजपा को क्षेत्र में विस्तारित करने व नए सदस्यों को जोड़ने का श्रेय जाता है। सत्ता की आंधी में उस दौरान ढहे कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए गगनेंद्र सिंह ने संगठन के शीर्ष प्रबंधन के मार्गदर्शन में जिसप्रकार से पोलिंग स्तर तक कार्यकर्ताओं की टीम तैयार की उसकी झलक नागौद में आयोजित केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह के कार्यक्रम व कार्यकर्ता सम्मेलन में देखी जा चुकी है, जिसमें नागौद विधानसभा क्षेत्र की सभी 275 पोलिंग के कार्यकर्ता सम्मिलित हुए थे। क्षेत्र की पेयजल समस्या को समाप्त करने के लिए भदनपुर-परसमनिया जल परियोजना को स्वीकृत कराने का मसला हो अथवा उचेहरावासियों को पट्टे दिलाने के लिए की गई पहल का मामला , श्यामनगर बांध के जलमग्न रहने के लिए किए गए प्रयासों का मसला हो अथवा विद्यालयों के उन्नयन का मामला, इन मसलों के हल के लिए लगातार पांच वर्षों से की गई ने गगनेंद्र की मेहनत उन्हें भाजपा की चुनावी रेस का सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा बनाती है। उधर मुख्यमंत्री की जन आशीर्वाद यात्रा व भाजपा के अन्य संगठनात्मक कार्यक्रमों से नागेद्र सिंह की लगातार बनी रही दूरी से स्पष्ट नजर आ रहा है कि वे चुनावी रेस में बने रहने के इच्छुक नहीं है। हालंकि उनके करीबी बताते हैं कि नागेंद्र सिंह बेशक सांसद हैं, लेकिन विधानसभा के गलियारों में वे अभी भी चहलकदमी का इरादा रखते हैं, जिसके चलते टिकट की दौड़ में वे प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य व पूर्व जिपं अध्यक्ष गगनेंद्र सिंह को वे चुनौती दे सकते हैं।
किला भेदने की होगी चुनौती
नागौद विधानसभा क्षेत्र की भाजपाई राजनीति में बेशक गगनेंद्र सिंह का अभ्युदय हुआ हो और उन्होने संगठन से लेकर जनता के बीच जबरदस्त पकड़ भी बनाई हो लेकिन यह भी सच है कि इस क्षेत्र में भाजपा की राजनीति किले के इर्द-गिर्द सिमटी रही है। लंबे समय तक भाजपा में दबदबा रहने के कारण नागौद राजघराना अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बेताब रहेगा, ऐसे में गगनेंद्र सिंह को टिकट मिलने पर किला उनका कितना समर्थन करेगा , यह देखना दिलचस्प होगा। हालांकि गगनेंद्र की विधानसभा की सभी 275 पोलिंग तक पहुंच उन्हें सशक्त बनाती है, ब देखना यह है कि संगठन किस पर भरोसा जताता है।
ये भी दौड़ में पर सोशल मीडिया में अधिक
हालांकि खजुराहो सांसद नागेंद्र सिंह व गगनेंद्र सिंह के अलावा जिपं उपाध्यक्ष डा. रश्मि सिंह ने भी संगठन के समक्ष अपनी दावेदारी दिखाई है, लेकिन उनकी सक्रियता जमीनी स्तर पर कम , सोशल मीडिया पर अधिक है। यदि हम जिले के नेताओं के प्रचार तंत्र पर नजर दौड़ाएं तो रश्मि सिंह सोशल मीडिया पर सबसे अधिक सक्रिय रहने वाली नेता हैं। वे ेएसी उपलब्धियों के लिए भी सोशल मीडिया पर अपनी पीठ थपथपाती रही हैं जो उपलब्धियां या तो स्वमेव अथवा क्षेत्रीय विधायक व अन्य नेताओं के प्रयासों से हासिल हुई हैं। मसलन विगत दिवस एक निजी कंपनी ने अपने मोबाइल टावर परसमनिया क्षेत्र में गाड़े तो उसे भी अपनी उपलब्धियों में जोड़कर रथ दौड़ा दिया, गोया उनके प्रयासों से निजी कंपनी ने अपने टावर गाड़े हैं। समय-समय पर कई ऐसे कामों की उपलब्धियों का श्रेय लेने में भी उन्होने हिचक महसूस नहीं की , जिन कामों के होने का संबंध उनसे नहीं था। सूत्र बताते हैं कि बीते दिनों मुख्यमंत्री जन आशीर्वाद यात्रा के पहुचने के पूर्व ऐसी ही प्रोपगांडा की राजनीति की कवायद कर रही रश्मि सिंह को किरकिरी का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर अतिसक्रियता दिखाकर समय से पूर्व अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की रश्मि की कवायदों ने उनकी राजनीति को हलका बना दिया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि विधानसभा की चुनावी रेस से नागेद्र सिंह बाहर रहे तो रश्मि सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर राजनैतिक गोले दाग सकते हैं।
पूर्व जिला अध्यक्ष पर भी निगाहें
टिकट के मामले में भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह बघेल पर भी निगाहे हैं। सत्ता-संगठन के करीबी माने जाने वाले सुरेंद्र सिंह बघेल भी नागौद विधानसभा क्षेत्र से आते हैं, हालांकि उनकी रूचि चुनावी तैयारियों में कम बल्कि संगठन को मजबूती प्रदान करने में ज्यादा रही है।
दुखती रग है बरगी का पानी
तत्कालीन मंत्री नागेंद्र सिंह द्वारा तकनीकी बाधाओं को दरकिनार कर अविलंब बरगी नहर का पानी लाने के लिए जनता को तकरीबन 6 वर्षपूर्व दिखाया गया सब्जबाग भाजपा क ी दुखती रग बन गया है। बरगी का पानी अब तक नहीं पहुंच सका है जिसके चलते जनता में नाराजगी है। हालांकि विगत दिवस जन आशीर्वादयात्रा के दौरान गगनेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री से इस बारे में चर्चा की जिसे संजीदगी से लेते हुए सीएम शिवराज सिंह चौहान ने क्षेत्रवासियों को आश्वस्त किया है कि बरगी नहर परियोजना को जल्द पूरी कराने ठोस कदम उठाए जाएंगे ताकि नर्मदा के जल का लाभ स्थानीय किसान ले सकें।
चार बार नागेंद्र , तो तीन बार रामप्रताप
नागौद विधानसभा क्षेत्र के चुनावी इतिहास में दो नेताओं का दबदबा रहा है। 1967 से प्रारंभ हुए चुनावी सफर को देखें तो पहला चुनाव कांग्रेस के वी. प्रसाद ने जीता था जबकि 1972 में कांग्रेस के बाला प्रसाद ने फतह हासिल की थी। इसके बाद हुए 9 चुनावों में चार बार नागेंद्र सिंह (1977,1980,2003,2008)व तीन मर्तबा रामप्रताप सिंह (1985,1990व 1998 )ने बाजी मारी है।