मुंबई, “मेरी बचपन की सबसे प्यारी यादें मेरी बड़ी बहन और छोटे भाई से जुड़ी हुई है। हम तीनों में से मेरा भाई सबसे ज्यादा शैतान था। उसकी अनोखी हरकतें कभी खत्म ही नहीं होती थी। मुझे अभी भी याद है कि जब हमारी माँ कुछ घंटों के लिए घर से बाहर जाती थीं, तो हम लोग लुका-छिपी जैसे खेल खेलते थे। हम अपने छोटे भाई की खूब टांग खिंचाई करते थे और हर बार चालाकी से उसी पर सारा दोष लगा देते थे। दूसरी चीज जिसका मैंने सबसे अधिक लुत्फ उठाया है वह है कार्टून देखना, जो आज भी मेरा सबसे पसंदीदा पासटाइम है! (हंसती है) टॉम एंड जेरी मेरे सबसे अधिक पसंदीदा कार्टून थे।

मैं बचपन में ज्यादा शरारती नहीं थी, बल्कि सौम्य और शर्मीली तथा अंतरमुखी थी। मैं खूब पढ़ाकू थी और मुझे ड्रामा और थियेटर में भाग लेना काफी पसंद था। मैंने बहुत कम उम्र में ही अपने स्कूल में एक थियेटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया था। जिसकी वजह से अभिनय के प्रति अपने प्यार को पहचानने में मुझे बेहद मदद मिली।

आज, जब हम बाल दिवस मना रहे हैं तो मैं बस यही कहना चाहती हूँ कि बचपन का मतलब ही मासूमियत और चंचलता है, यह खुशी और स्वतंत्रता का प्रतीक है, मैं सभी े बच्चों को चिल्ड्रन्स डे की शुभकामनाएं देती हूँ।” रोहिताश्व गौड़, ‘भाबीजी घर पर हैं के‘ तिवारीजी “मैंने अपना अधिकांश बचपन शिमला के अत्यधिक ठंडे मौसम में बिताया है। जब मैं छोटा था तो मुझे कीचड़ में खेलने की आदत थी और मैं किसी लिफाफे में इसे भरकर घर भी ले आता था। जिसे बाद में मैं अपने भाई या बहन के सर में डाल देता था, ताकि उन्हें ठन्डे मौसम में जबरन स्नान करना पड़े।

मुझे याद है कि मैंने ऐसा अपनी एक आंटी के साथ भी किया था, जो अपने लंबे बालों में तेल लगाकर बस निपटी ही थी। मेरे मिट्टी डालने की वजह से उन्हें बर्फ जैसे ठन्डे पानी से तुरंत सर धोना पड़ा। इस बात से घर पर सब लोग काफी नाराज हुए और मुझे डांट भी पड़ी। यहाँ तक कि मुझे घर का ‘बदतमीज शरारती लड़का’ कहा गया और बहुत सालों तक मैं वैसा ही बना रहा। (हँसते हैं) जब मैं बड़ा हो गया तो मैंने यह आदत छोड़ दी लेकिन फिर भी मेरे मन के एक कोने में शरारती लड़का छिपा रहा, जो दूसरों के साथ मस्ती करने का कोई मौका नहीं छोड़ता। मेरा मानना है कि हरेक को अपने अंदर के बच्चे को कभी खत्म नहीं होने देना चाहिए। बचपन की सबसे मजेदार चीजों में से एक थे कार्टून। हर बच्चे की अपनी पसंद थी और मेरी पसंद चाचा चैधरी थे! इसमें विशेष रूप से बुरे लड़कों को सबक सिखाने के लिए हास्य और दिलचस्प सामग्री का सही संतुलन या बैलेंस था।

हम सभी इसे खासा पसंद करते हैं और आज भी मैं इसे अपनी बेटियों के साथ ऑनलाइन देखता हूँ और हम सभी इसके ऑनलाइन एपिसोड्स देखने का खूब आनंद उठाते हैं।” जिया शंकर उर्फ ‘मेरी हानिकारक बीवी‘ की इरा “बचपन के बारे में सबसे अच्छा हिस्सा स्कूल के दिनों का था। मुझे याद है कि हमारा स्कूल बाल दिवस पर एक स्कूल पिकनिक का आयोजन करता था, जहाँ हमें अपने पसंदीदा आरामदायक कपड़े पहनने के लिए कहा जाता था, न कि हमारी रोज वाली स्कूल की वर्दी। पूरे साल हम इस पिकनिक ट्रिप का इंतजार करते थे। वे आमतौर पर हमें वाटर पार्क, नेशनल पार्क या म्यूजियम जैसी जगहों पर ले जाते थे, जहाँ हम स्कूल के अन्य साथियों के साथ आनंद ले सकते थे, सीख सकते थे और उनसे जुड़ सकते थे। वे सभी स्कूल की पिकनिक काफी मनोरंजक थी क्योंकि हमारे शिक्षक और अभिभावक उस दिन हमें बहुत लाड़-प्यार करते थे। काश, मैं उस समय में वापस जा सकती और अपने बचपन के दिनों को फिर से जी सकती क्योंकि वे मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन थे। ये यादें मेरे दिमाग में ताजा हैं और मैं उनका लुत्फ जीवन भर उठाऊंगी।” गौरांश शर्मा यानी ‘मेरी हानिकारक बीवी‘ से छुट्टन “मेरे बचपन की सबसे अच्छी यादों में से एक वह टैलेंट काॅम्पीटिशन है जिसमें मैंने तब भाग लिया जब मैं पहली कक्षा में था।

मैं काफी नर्वस था, लेकिन मेरी माँ ने मेरा काफी उत्साहवर्धन किया। मैंने अपनी माँ के पसंदीदा गाने ‘नन्हा मुन्हा राही हूँ’ पर परफाॅर्म किया और मुझे अच्छे से याद है कि वह दूसरी पंक्ति में वीडियो कैमरा लेकर बैठी थी, और पूरी परफाॅर्मेंस के दौरान मेरी हौसला-आफज़ाई कर रही थी। वो हमेशा मेरे लिए एक मजबूत सपोर्ट पिलर रही हैं। वो आज भी मेरी सबसे बड़ी सपोर्टर हैं और मेरी ऊर्जा का स्रोत हैं। अगर मैं कोई गलती कर दूं तो वो मुझ पर नाराज नहीं होती है बल्कि मेरे साथ बात करके उन्हें सुलझाती हैं। मुझे केवल एक बात के लिए उनसे डांट पड़ती थी मैं अपनी सब्जियां खाना छोड़ देता (हंसते हुए) और अपना होमवर्क पूरा किए बिना खेलने के लिए नीचे चला जाता। मैं हमेशा मेरी बेस्ट फ्रेंड सिद्धिका के साथ आउटडोर गेम्स खेलने का लुत्फ उठाता, जो मुझसे तीन साल बड़ी थी। हम किंडरगार्डन से ही बेस्ट फ्रेंड रहे हैं और चूँकि वह मेरे घर के पड़ोस में ही रहती थी तो हम दोनों साथ में काफी समय बिताते थे। हमारा सबसे अच्छा टाइमपास होता था अपने डॉल हाउस में एक टी पार्टी आयोजित करना, जिसे कि हम दोनों मिलकर तैयार करते थे। लेकिन अब मैं उसे काफी अधिक याद करता हूँ क्योंकि वह आगरा चली गई हैं।” आर्यन प्रजापति यानी ‘हप्पू की उलटन पलटन‘ से ऋतिक “जब भी मेहमान हमारे घर पर आते थे तो मुझे उनके सामने अभिनय करना और परफाॅर्म करना काफी अच्छा लगता था। मैं जब चार साल का था, तब से मुझे याद है कि मैं ऐसा करता था। मुझे अक्सर नकल करने और हाथी के रोने की आवाज निकालने के लिए कहा जाता था क्योंकि सबको लगता था कि मैं यह बहुत अच्छी तरह से करता हूँ। मेरी माँ ने तभी मेरे अंदर की अभिनय की प्रतिभा को पहचान लिया था। जिसके चलते उन्होंने मुझे प्रोत्साहन देना शुरू किया। वे टीवी और फिल्मों के लिए होने वाले ऑडिशन में मेरे साथ जाती और लंबी लाइन में प्रतीक्षा करती। वह मेरे लिए मेरी बेस्ट फ्रेंड हैं, जिसके साथ मैंने सबसे अधिक समय बिताया है, यहाँ तक की हप्पू की उलटन पलटन के सेट पर भी। दूसरे बच्चे अपने दोस्तों के साथ पढ़ाई करते हैं लेकिन मेरी माँ सेट पर आकर मेरे खाली समय में पढ़ाई में मेरी सहायता करती। निश्चित रूप से वह मुझे डांटती भी हैं, जब मैं कोई सब्जी खाने से इंकार कर देता हूँ या घर पर ज्यादा नखरे दिखाता हूँ लेकिन मुझे अपना अधिकांश समय उनके साथ बिताना बहुत अच्छा लगता है।” सारिका बहरोलिया उर्फ ‘गुडिया हमारी सभी पे भारी‘ की गुड़िया “एक बच्चे के रूप में मेरा व्यक्तित्व और स्वभाव आज जो मैं हूं, उससे बिल्कुल अलग था। मैं एक बहुत अधिक शर्मीली और नर्वस बच्ची थी, जो किसी प्रश्न का सही जवाब देने के लिए बमुश्किल ही हाथ उठाती थी। ऐसे में दर्शकों के सामने अभिनय करने की बात तो छोड़ ही दीजिए। मुझे इस मूड से बाहर आने में और आत्मविश्वासी होने में कुछ साल लगे। मेरा मानना है कि अभिनय के लिए मेरी रुचि और जुनून ने मुझे साहसिक व्यक्ति बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक बच्चे के रूप में मेरे पास बहुत सारी यादें हैं, लेकिन मैं अपने छोटे भाई के साथ की यादों से बहुत प्यार करती हूं। वह हम सबमें काफी शरारती था और उसकी हरकतें कभी खत्म ही नहीं होती थी। मुझे याद है कि जब मेरी माँ कुछ घंटों के लिए बाहर जाती थी तो मैं कभी-कभी पूरे घर की सफाई कर देती थी ताकि जब वे आएं उन्हें एक साफ सुथरा घर मिलें। मुझे प्रैंक करने की कोशिश में मेरा भाई कुछ हिस्सा गंदा कर देता और उसकी इस हरकत के लिए मुझे डांट पड़ती। हालांकि मैं उसकी पोल अपनी माँ के सामने खोल देती थी लेकिन यह कुछ सालों तक ऐसी ही चला जब तक कि माँ को उसकी शरारतें समझ आई। उसके द्वारा खेले गए सभी प्रैंक के बावजूद, मुझे नहीं लगता कि मुझे उससे बेहतर विश्वासपात्र और दोस्त मिल सकता था। छोटे-छोटे मामलों पर लड़ने से लेकर युवा और किशोरवय में अपने सीक्रेट साझा करने तक, हमारे संबंध विकसित हुए हैं और आज भी जब हम मिलते हैं, तो हम अक्सर हमारे द्वारा एक-दूसरे के साथ बिताए गए कुछ अनमोल पलों को याद करते हैं।”