निर्भया कांड: दांतों की साइंस ने भारत में पहली बार गुनहगारों को दिलाई सजा
नई दिल्ली
अपराध, अपराधी, जेल और सजा... इन कड़ियों के बीच सबसे अहम होता है आईओ, यानी इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर। निर्भया गैंगरेप केस ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। कम ही लोगों का पता है कि दरिंदों को सजा दिलाने में तमाम सबूतों में अहम और अनोखा सबूत था फरेंसिक डेंटिस्ट्री। भारत में पहली बार किसी जघन्य अपराध में आरोपियों को पकड़वाने के लिए इस साइंस की मदद ली गई थी। इससे पहले भारतीय फरेंसिक साइंस में इसका जिक्र तक नहीं था। इतना ही नहीं, निर्भया केस दुनिया का पहला ऐसा केस था, जिसमें बयान शब्दों के बजाय इशारों से दर्ज कर लिए गए। उस समय वसंत विहार के एसएचओ और निर्भया केस के आईओ इंस्पेक्टर अनिल शर्मा (इन दिनों कीर्ति नगर के SHO) ने एनबीटी से अनछुए पहलुओं को साझा किया। जानिए कैसे जांच आगे बढ़ी, उन्हीं की जुबानी।
उस रात 5 घंटे सीक्रेट मीटिंग
रात को तब के जॉइंट सीपी विवेक गोगिया और हम पांच चुनिंदा लोग थे। बंद कमरे में 5 घंटे तक केस की तहकीकात को लेकर सीक्रेट मीटिंग चली। यह 'करो या मरो' वाली मीटिंग थी। इसमें मैं खुद, जब के इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह, इंस्पेक्टर यशवीर, इंस्पेक्टर नीरज चौधरी और निर्भया की मौत से पहले की आईओ प्रतिभा शर्मा मौजूद थीं। जॉइंट सीपी ने कहा, बच्ची को हर हाल में न्याय दिलाना है। इस केस के अंदर ऐसे एविडेंस लाकर दो, जो भविष्य में न सिर्फ माइलस्टोन बनें बल्कि यह केस मिसाल भी बने। इसके लिए तहकीकात के सभी दरवाजे खुले हैं। बस, उसी समय से हमारा क्रिएटिव माइंड काम करने लगा।
जैसे जानवरों ने नोच खाया हो
मैंने दिन-रात इंटरनेट पर दुनियाभर के क्राइम केसों की 300 से ज्यादा वेबसाइट्स खंगाल डालीं। फरेंसिक डेंटिस्ट्री का पता चला। दांतों के जरिए इंसान की पहचान करने की साइंस को फरेंसिक डेंटिस्ट्री कहते हैं। फिर भारत में इस साइंस के काबिल वैज्ञानिक की खोज की। डॉ. असित आचार्य का नाम मिला। दरअसल, जब बच्ची के शरीर को देखा तो दांत काटने के इतने निशान थे, मानो जानवरों के झुंड ने नोच डाला हो। देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। गुनहगारों के खिलाफ इसे अहम सबूत बनाने की मुहिम मेरे दिमाग में आई। फरेंसिक डेंटिस्ट्री का पता चला। दांतों और जबड़े की मदद से जुर्म को सुलझाने की मन में ठान ली। ऐसा इसलिए क्योंकि दो इंसानों के दांतों का पैटर्न एक जैसा नहीं होता।
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