पिछले तीन वर्षों में हुए 221 रेल हादसे, 324 लोगों की मौत : पीयूष गोयल
नई दिल्ली
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने बुधवार को लोकसभा में कहा कि पिछले तीन वर्षों में 221 रेल हादसे हुए जिनमें 324 लोगों की मौत हो गई और 628 लोग घायल हुए। मनसुखभाई धनजीभाई वसावा और भरत सिंह के प्रश्न के लिखित उत्तर में गोयल ने पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए रेल हादसों का आंकड़ा दिया। उनकी ओर से पेश आंकड़े के अनुसार 2016-17 में 104 रेल हादसे हुए जिनमें 238 लोगों की मौत हो गई और 369 लोग घायल हो गए। तो वहीं दूसरी तरफ, 2017-18 में 73 रेल हादसे हुए जिनमें 57 लोगों की मौत हो गई और 197 लोग घायल हो गए। मंत्री के मुताबिक 2018-19 (30 नवंबर तक) में देश भर में 44 रेल हादसे हुए जिनमें 29 लोगों की मौत हो गई और 62 लोग घायल हो गए।
क्यों बड़ रहे है रेल हादसे ?
दरअसल, रेलवे की यह स्थिति एक दिन में नहीं हुई है। केंद्र में रेल मंत्री बनने वाले तमाम नेताओं ने जातीय समीकरणों और वोट बैंक का ध्यान रखते हुए आधारभूत ढांचे की परवाह किए बिना हर साल लगातार नई ट्रेनें चलाईं। वह चाहें ममता बनर्जी हों या फिर लालू प्रसाद यादव। नतीज यह हुआ कि पटरियों पर बोझ लगातार बढ़ता रहा। ट्रेनों की तादाद बढ़ने के साथ-साथ मरम्मत व रखरखाव के लिए कर्मचारियों की कमी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया। इसके अलावा बड़े हादसों के बाद सरकार ने उनकी जांच और सुरक्षा के उपाय सुझाने के लिए समितियों का गठन तो करती रही। लेकिन उनकी सिफारिशों को लागू करने के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखाई।
काकोदकर समिति ने तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि रेलवे के आधारभूत ढांचे पर बोझ बहुत बढ़ गया है। इसकी वजह से ट्रैफिक के नियंत्रण के लिए पैसा और समय दोनों नहीं मिल पाता है। उसका कहना था कि रेलवे की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण का गठन कर सुरक्षा आयुक्त को उसी के तहत रखा जाना चाहिए। समिति ने प्रशासनिक ढांचे में सुधार के लिए अगले पांच वर्षों में 1।40 लाख करोड़ के निवेश की सिफारिश की थी। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस के अलावा बाकी तमाम ट्रेनों में ऐसे कोचों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो 50 किलोमीटर प्रति घंटे की गतिसीमा के लिए बने हैं। काकोदकर और पित्रौदा समितियों ने रेलवे के आईसीएफ कोचों को आधुनिकतम एलएचबी कोचों से बदलने की भी सिफारिश की थी। एलएचबी कोच हादसे की स्थिति में एक-दूसरे पर नहीं चढ़ते। इससे जान का नुकसान कम होता है। लेकिन एलएचबी कोचों की भारी कमी को ध्यान में रखते हुए फिलहाल इसमें पांच साल या उससे ज्यादा का समय लग सकता है। फिलहाल देश में महज सात हजार एलएचबी कोच हैं जबकि आईसीएफ कोचों की तादाद 50 हजार से ऊपर है। वर्ष 2019 तक आईसीएफ कोचों का उत्पादन जारी रहेगा। यानी आईसीएफ और एलएचबी कोचों का फासला कम करने में अभी और ज्यादा वक्त लगने का अनुमान है।
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