बिना विषय विशेषज्ञ के 10 वर्षों से चल रही टीशू कल्चर लैब
रायपुर।
हरियाली के लिए पूरे देश में दंभ भरने वाले छत्तीसगढ़ की ग्रीनरी की हकीकत का अंजादा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की इकलौती टीशू कल्चर लैब में स्थापना काल से आज तक विषय विशेषज्ञ की तैनाती ही नहीं हुई है। विभाग में तैनान वन सेवक के भरोसे, उसी के द्वारा तैनात मदर प्लांट के कुछ टीशू का प्रोटोकॉल तैयार किया जाता है। करोड़ों की लागत से बनी इस लैब के औचित्य के सवाल पर सभी चुप्पी साध लेते हैं।
वन विभाग ने वर्ष 2006 में 11वें वित्त से इस लैब की स्थापना की। दो खंडों में निर्माण के बाद वर्ष 2008 में यह तैयार तो हो गई पर वहां विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं हुई। लैब क्यों बनाई गई, उसका उद्देश्य क्या था, राज्य वन अनुसंधान संस्थान के निर्माण के बाद इस लैब को क्यों नहीं हस्तांतरित किया गया यह कुछ यक्ष प्रश्न हैं जो वर्षों से टीशू कल्चर लैब के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं।
प्रतिवर्ष 13 लाख का बजट
वन विभाग के टीशू कल्चर लैब को प्रतिवर्ष 13 लाख रुपये का बजट दिया जाता है। इनमें से नौ लाख के आस-पास बिजली बिल पर खर्च हो जाता है। शेष पैसे लैब में बोतल साफ करने वाले श्रमिकों को बतौर पारिश्रमिक दिया जाता है।
वन सेवक है लैब के इंचार्ज
राज्य के इकलौती टीशू कल्चर लैब के प्रभारी का कार्य स्थापना काल से ही वन विभाग में वन सेवक वानिकी के पद पर तैनात चंद्रशेखर धुरंधर संभाल रहे हैं। वे अपने तीन सहयोगियों के साथ अनुसंधान करते हैं। धुरंधर ही यहां टीशू से कल्चर तैयार करते हैं। हालांकि यह उनका कार्य नहीं है पर वे इसे लंबे समय से बड़ी खूबसूरती से कर रहे हैं।
क्या है टीशू कल्चर
टीशू कल्चर वनस्पति विज्ञान में एक शोध की लंबी प्रक्रिया है। सीधे शब्दों में कहें तो कांच के बर्तन में कृत्रिम वातावरण के बीच तैयार किए पौधों को टीशू कल्चर कहते हैं। पौधों की कोशिकाओं से तैयार टीशू के गुण को दूसरे पौधे में विकसित किया जाता है।
वन अनुसंधान संस्थान को होना चाहिए था हस्तांतरित
वन विभाग की टीशू कल्चर लैब को नियमानुसार राज्य वन अनुसंधान संस्थान को सौंप दिया जाना चाहिए था, क्योंकि इस संस्थान की स्थापना ही शोध के लिए की गई है। विभागीय अधिकारियों के वर्चस्व के कारण टीशू कल्चर लैब का स्वतंत्र अस्तित्व आज भी बना हुआ है।
जारी है निर्माण कार्य भी
आश्चर्यजनक बात यह है कि पूर्व से ही इस लैब का कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा था बावजूद इसके वन विभाग ने यहां निर्माण कार्य भी प्रारंभ करा दिया। लाखों रुपये खर्च करने के बाद निर्माण कार्य रोक दिया गया। कारण यह था कि विभागीय स्वीकृति नहीं मिली। ऐसे में सवाल यह है कि जब स्वीकृति नहीं मिली तो निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ क्यों।
शासन को लिखा है पत्र
रायपुर वनमंडलाधिकारी उत्तम गुप्ता ने बताया कि शासन को लैब में वैज्ञानिक की तैनाती के लिए कई बार पत्र लिखा गया है। कैंपा योजना के तहत बांस के टीशू कल्चर तैयार करने के लिए वैज्ञानिक की तैनाती की भी गई है। निर्माण कार्य के बाबत उन्होंने कुछ स्पष्ट कहने के इंकार कर दिया। इतना कहा कि निर्माण कार्य फिलहाल रोक दिया गया है।
bhavtarini.com@gmail.com 
