महाराजा पर बवाल: सिंधिया बोले, दादी के लिए ये शब्द क्यों नहीं बोले!

भोपाल मध्य प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरफ से कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को महाराजा कहने पर बवाल मचा हुआ है. कांग्रेस की चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख सिंधिया ने जवाब देते हुए कहा कि जिस तीखे अन्दाज में वो उन्हें महाराजा कहते हैं, उसी तीखे अन्दाज़ में उन्होंने कभी उनकी दादी राजमाता सिंधिया को ऐसा क्यों नहीं कहा. सिंधिया ने कहा कि शिवराज सिंह तय करें कि कोई राजा-महाराजा है या नहीं है. कभी राजा महाराजा के नाम पर गाली मुझे देते हैं, कभी कहते है कि ये राजा महाराजा और पिछड़े वर्ग की लड़ाई है. जिस तीखी आवाज से राजा महाराजा का नाम अभी ले रहे हैं, उसी अंदाज़ में मेरी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया के लिए इन शब्दों का प्रयोग करते. ये नहीं हो सकता कि चित भी मेरी और पट भी मेरा. मध्य प्रदेश में महागठबंधन बनाने के लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के कांग्रेस को फीफा कप जीतने वाली फ्रांस की टीम से सीखने की बात पर सिंधिया ने सहमति जताई. उन्होंने कहा कि भारत ख़तरे में है और जो भी शख़्स भारत के संविधान से प्यार करता है, उसे मिलकर भारत के झंडे की लड़ाई लड़नी है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा, 'काश जिस तीखी आवाज से राजा-महाराजा का नाम सीएम अभी ले रहे हैं, उसी तीखी आवाज से उस वक्त लेते जब शिवराज पहली बार सांसद बने थे, तब इसी शैली में मेरी दादी राजमाता के खिलाफ भी इन्हीं शब्दों का प्रयोग करते. ये नहीं हो सकता कि चट भी मेरा और पट भी मेरी.' गौरतलब है कि हाल ही में भोपाल पहुंचे अखिलेश यादव ने कहा था कि फ्रांस की टीम में दूसरे देशों के अच्छे खिलाड़ी हैं. जिनकी वजह से वो फुटबॉल का वर्ल्ड कप जीते हैं. इसी तरह 2019 के आम चुनाव का वर्ल्ड कप जीतने के लिए कांग्रेस को दूसरे दलों के साथ यही रवैया अपनाना चाहिए. सिंधिया ने कहा कि अखिलेश जी का मैं सम्मान करता हूं, वो मेरे क़रीबी है. वो बिल्कुल ठीक कह रहे है. हम सबको मिलकर काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज सवाल सिर्फ़ कांग्रेस, सपा, बीएसपी, एनसीपी या आरजेडी का नहीं है, सवाल भारत का है. आज भारत ख़तरे में है. अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़तरे में है, महिला ख़तरे में है. किसान खतरे में है. उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति भारत के संविधान को प्यार करता है, उसे भारत के झंडे की लड़ाई लड़नी है. अगर इस उसूल और सिद्धांत पर हम सहमत हैं तो सीट का मामला कोई कठिन मामला नहीं है.