सपाक्स को नहीं मिल पा रहे प्रत्याशी: ललित शास्त्री

सपाक्स को नहीं मिल पा रहे प्रत्याशी: ललित शास्त्री
भोपाल, प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ने वाली सामान्य, पिछड़ा, अल्पसंख्यक वर्ग कर्मचारी संस्था (सपाक्स) का राजनीति में आते ही बुरा हाल है| प्रदेश की सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान करने वाली सपाक्स पार्टी का हाल गड़बड़ा गया है, चुनाव से पहले पार्टी के सामने एक के बाद एक बड़ी चुनौती सामने हैं| एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सवर्णों की नाराजगी का भी सपाक्स को लाभ मिलता नहीं दिख रहा है, यहां तक कि पार्टी को प्रत्याशी भी नहीं मिल पा रहे हैं| वहीं जबलपुर में ललित शास्त्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुद को संस्था का संस्थापक बताते हुए हीरालाल त्रिवेदी पर गंभीर आरोप लगाए हैं और चुनाव आयोग को एक पत्र लिखकर त्रिवेदी की शिकायत भी की है| ललित शास्त्री ने चुनाव आयोग से मांग की है कि 'सपाक्स' नाम से किसी भी राजनैतिक दल के गठन की मंजूरी ना दी जाए क्योंकि इस नाम की संस्था वो दो साल पहले 2016 में ही रजिस्टर करवा चुके थे| अब सपाक्स के चुनाव लड़ने पर भी संकट खड़ा हो गया| शास्त्री ने अमित खम्परिया को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जबकि चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ ही हीरालाल त्रिवेदी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन अब शास्त्री ने त्रिवेदी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि त्रिवेदी सपाक्स संस्था में सिर्फ संरक्षक सदस्य हैं जिन्हें संस्था के संचालन से जुड़ा कोई भी फैसला लेने का अधिकार नही हैं| अब सवाल खड़े हो रहे हैं आखिर सपाक्स का सरताज कौन? इन सब चुनौतियों के बाद भी सपाक्स की जमीनी स्तिथि भी चिंतनीय है, प्रत्याशी चयन को लेकर भी भारी मशकत से गुजरना पड़ रहा है|  इसका ताजा उदाहरण रतलाम में सामने आया जहाँ पहले कयास लगाए जा रहे थे कि उम्मीदवारों की भीड़ खड़ी होगी लेकिन पर्यवेक्षक सपाक्स संगठन महासचिव सुरेश तिवारी और संभागीय अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी को खाली कुर्सियां ही मिली| यहां वे उम्मीदवारों की खोज में पहुंचे थे, लेकिन होटल पलाश के हॉल में लगी 50 में से 35 कुर्सियां खाली थी, सिर्फ 15 लोग ही खड़े थे| इस पर सुरेश तिवारी भड़क गए और जिला संयोजक पुष्पेंद्र जोशी की क्लास ले ली| जवाब आया केवल कोर कमेटी के लोगों को खबर की थी | दोनों के बीच काफी नौक झोक भी हुई| वहीं क्षेत्र में सपाक्स के नाम पर दम भर रहे लोग दावेदारी के लिए मौके पर पहुंचे ही नहीं| दोनों पर्यवेक्षकों ने भी रायशुमारी की औपचारिकता पूरी कर ली और खाली हाथ लौट गए| वहीं यह बात भी सामने आई कि सपाक्स से दावेदारी कर रहे कई लोग भाजपा से जुड़े हुए लोग ही हैं और उपेक्षा के शिकार होने पर चुनावी समय में सपाक्स से चुनाव लड़ने की हवा बना रहे थे| लेकिन सपाक्स की स्तिथि को देखते हुए कोई भी सामने आने की हिम्मत नहीं कर पाया, यही हाल अधिकतर विधानसभाओं का है| आरक्षण की खिलाफत करने वाली संस्था का राजनीतिक पार्टी बनते ही राजनीति में उदय से पहले बिखराव चर्चा का विषय बन गया है|