2019 में बीजेपी की नैय्या पार लगाएंगे छोटे दल, ये है अमित शाह की रणनीति!

नई दिल्ली
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 9 जुलाई को जब चेन्नै में पार्टी के महाशक्ति केंद्र और शक्ति केंद्र के प्रभारियों से मिले तो उन्हें यह बताया गया कि ''विपक्षी दल यह कह कर पार्टी का उपहास उड़ा रहे हैं कि तमिलनाडु में भाजपा ढूंढने से भी नहीं मिलती है.''

हल्की सी मुस्कान के साथ शाह ने उत्तर दिया, "यदि विपक्ष को तमिलनाडु में भाजपा को ढूंढना है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ईवीएम में ढूंढ ले. इसमें कोई संशय नहीं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में भाजपा बड़ी ताकत बन कर उभरने वाली है.''

उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया, "अगामी लोकसभा चुनाव से पहले हम उचित समय पर तमिलनाडु में गठबंधन की घोषणा करेंगे. जिसके साथ भी गठबंधन करेंगे, यह सुनिश्चित होगा कि राज्य भ्रष्टाचार से मुक्त होकर विकास के पथ पर अग्रसर हो.''

शाह का यह बयान अनायास नहीं है. दरअसल, उन्होंने तमिलनाडु के साथ ही उन राज्यों से भी पिछले दो लोकसभा और विधानसभा चुनावों का पूरा ब्यौरा लेकर भावी योजना का खाका तैयार कर लिया है जहां पार्टी की उपस्थिति नाम मात्र है.

ऐसे राज्यों में अपने चुनावी प्रदर्शन को प्रभावी बनाने के लिए भाजपा छोटे-छोटे दलों (पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त) के साथ गठजोड़ की राह तलाश रही है. ऐसे दलों से संपर्क साधने का सिलसिला भी शुरू हो गया है.

भाजपा की यह रणनीति शाह के उस लक्ष्य के लिहाज से भी माकूल है जिसमें उन्होंने 2019 में भाजपा का वोट प्रतिशत 50 फीसदी करने की बात की है. अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के नेता यह मानते हैं कि ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के सत्ताधारी दल या मुख्यमंत्री इतने कद्दावर हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में सफलता हासिल करना पार्टी के लिए कठिन है.

वहीं पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले वाले जिन राज्यों में शानदार प्रदर्शन किया था वहां भाजपा विरोधी दल लामबंद हो रहे हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड दिल्ली, हरियाणा और पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं.

 

भले ही इन राज्यों के प्रभावशाली दल आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं लेकिन अपना अस्तित्व बचाने के लिए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रोकने के नाम पर सभी आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट हो रहे हैं.

इसका खामियाजा पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए उपचुनावों में भाजपा को भुगतना भी पड़ा है. जिन राज्यों में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है वहां भी भाजपा की राह 2014 की तरह आसान नहीं दिख रही. मसलन, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा.

इन राज्यों में भाजपा को भी सत्ताविरोधी रुझान का एहसास है. अमित शाह यह बात कई बार दोहरा चुके हैं, "जिन राज्यों में 2014 में पार्टी को बड़ी सफलता मिली थी, वहां कुछ सीटों का नुकसान हो सकता है. इस कमी की भरपाई हम दूसरे राज्यों से करेंगे. कोरोमंडल राज्य और तटीय राज्यों में भाजपा को 2019 में अच्छी सफलता मिलेगी.'' पिछले दो साल से उन्होंने अपनी टीम को ऐसे 150 सीटों पर काम करने के लिए लगाया भी है, जहां भाजपा की उपस्थिति नाममात्र है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "यह सच है कि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल या तेलंगाना में पार्टी एक ताकत तो है पर अकेले सीट जीतने की स्थिति में नहीं है. पर यह सिक्के का एक पहलू मात्र है.

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि भाजपा इन राज्यों में छोटे-छोटे सहयोगी दलों को अपने साथ जोड़कर वहां बड़े दल को टक्कर देने की स्थिति में आएगी.'' उनका तर्क है कि त्रिपुरा में भाजपा ने ऐसा ही किया था. वहां के छोटे-छोटे दलों को साथ जोड़कर भाजपा ने राज्य में अपने बूते बहुमत हासिल कर लिया.

पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपना दल और फिर 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ समझौता करके बड़ी सफलता हासिल की. भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि पूरे देश में 70 से अधिक ऐसी छोटी-छोटी पार्टियां हैं जो भले ही अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकती हैं, लेकिन इन दलों के पास 50 हजार से लेकर 10 लाख तक वोट हैं.

ये वोट लोकसभा चुनाव के लिहाज से देखने में भले कम दिखते हों लेकिन अगर भाजपा के साथ ये दल जुड़ते हैं तो उन राज्यों में भी उसे बड़ी सफलता हासिल हो सकती है, जहां फिलहाल वह कमजोर मानी जाती है.

इनमें से कई छोटे दलों की पकड़ किसानों के बीच अच्छी है. कुछ दलों की मजदूर संगठनों में तो कुछ की आध्यात्मिक जगत के लोगों में अपनी पहचान है. मसलन, पीजेंट ऐंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियन से जुड़ा राजनैतिक दल है.

इसका प्रभाव महाराष्ट्र के रामगढ़, सोलापुर, नागपुर, नांदेड़, नासिक के अलावा आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी है. इस दल का छात्रों के बीच भी अच्छा काम है और इसका पुरोगामी युवा संगठन नामक छात्र संगठन काभी प्रभावी है. यह दल विधानसभा में एक-दो सीट जीतती है, लेकिन लोकसभा चुनाव में बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाती.

भाजपा के रणनीतिकारों के मुताबिक, इन दलों के वोट अगर भाजपा को ट्रांसफर होते हैं तो जिन सीटों पर भाजपा 50 हजार से लेकर 1 लाख के वोट से हारती है वहां उसके प्रत्याशी जीत हासिल कर सकते हैं.