आदिवासी महिलाएं ‘चूल्हा’ छोड़ मैदान पर उतरीं, लगाए 'चौके-छक्के'

आदिवासी महिलाएं ‘चूल्हा’ छोड़ मैदान पर उतरीं, लगाए 'चौके-छक्के'

मंडला 
मध्यप्रदेश के मंडला जिले की आदिवासी औरतें, इन दिनों चूल्हा छोड़ पल्लू कसकर क्रिकेट के मैदान में 'चौके-छक्के' जड़ने में जुटी हैं. सभी महिलाएं साड़ी और परंपरागत वेशभूषा पहनकर मैदान मे क्रिकेट खेलती हैं और चौके-छक्के जड़ती हैं. आदिवासी बहुल मंडला जिले की इन औरतों ने खेलने का यह सिलसिला साल 2012 के बाद निर्भया की याद में शुरू किया था, जिसका आयोजन जिले की शशि पटेल के द्वारा कराया जाता है. शशि पटेल पेशे से जिले में एक समाज सेवक के रूप में है और इन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आदिवासियों और बैगा जातियों के लिए न्यौछावर करते हुए अब तक शादी ना करने का फैसला लिया है.

दरअसल 16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद ये महिलाओं को मजबूत करने के लिए एक पखवाड़ा चला रही है, जिसके लिए ये जिले के कई गांवों की कई बैगा, आदिवासी महिलाएं जो कभी घर से बाहर नहीं निकली थी और जिन्हें इनके अपने ही परिवार वाले नहीं समझते थे, ऐसी महिलाओं को घर की चारदिवारी से बाहर निकालकर चूल्हा चौकी से दूर करते हुए क्रिकेट के मैदान तक ले आई हैं.

क्रिकेट के मैदान में चौके –छक्के लगाती ये महिलाएं एक दूसरे को संदेश देती हैं कि हम किसी से कम नहीं है. आज आलम ये है कि जिले की अधिकांश महिलाएं खेल के मैदान तक पहुंच गई है, इतना ही नहीं आज कई जिले की महिलाएं भी क्रिकेट के मैदान में चौके- छक्के लगा रही हैं और पुरूष को खुल्ला चैलेंज कर रही हैं.

आदिवासी महिलाओं के खेल के मैदान मे चौके-छक्के को देख पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान भी आश्चर्यचकित हुए थे और उन्होंने एक ट्विट कर इंडियन महिला टीम की कप्तान मिताली राज और विराट कोहली को खेल देखने के लिए आमंत्रित किया था.

शशि पटेल इन महिलाओं कों मजबूत करने के लिए हर साल आईपीएल की तर्ज पर एक महिला क्रिकेट का आयोजन कराती हैं, जिसमें सभी आदिवासी महिला अपनी परम्परागत ड्रेस में क्रिकेट खेलती है. इनका काम यही खत्म नहीं होता है. ये समाज के लिये आए दिन कुछ ना कुछ करती रहती हैं. मां और पिता के गुजरजाने के बाद इन्होने अपनी जिंदगी कों .समाज और महिलाओं के प्रति समर्पित कर दिया है, इनका आदिवासियों के बीच किए हुए कार्य को देखते हुए दिल्ली और प्रदेश में कई बार अलग-अलग रूप में सम्मानित किया जा चुका हैं.