भोपाल। मप्र में बिजली कटौती पर बवाल मचा हुआ है। आवश्यकता से अधिक बिजली उत्पादन होने के बावजूद लगातार घोषित-अघोषित बिजली कटौती से सरकार घेरे में है। भाजपा सरकार की नाकामी का हो-हल्ला मचा रही है। वहीं सरकार का आरोप है की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के शासनकाल के दौरान खरीदे गए घटिया उपकरणों के कारण बिजली गुल हो रही है। सरकार ने भाजपा शासनकाल के दौरान हुई खरीदी की जांच कराने की बात कही है। अगर देखा जाए तो भाजपा सरकार के दौरान बिजली विभाग में कई बड़े घोटाले हुए हैं। एक साल पहले तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने आरोप लगाया था कि भाजपा के 15 साल के शासनकाल में 2,00,000 करोड़ से अधिक का घोटाला बिजली और उपकरणों की खरीदी में हुआ है। आखिर इतने बड़े घोटाले का गुनहगार कौन है?

दरअसल, 2003 में भाजपा बसपा यानी बिजली, सड़क और पानी को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी। इसलिए 15 साल के शासन के दौरान भाजपा का पूरा फोकस इन्हीं पर था। इस दिशा में काम तो खुब हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार भी खुब हुआ। यही कारण है कि आज घटिया उपकरणों के कारणों बिजली गुल हो रही है। जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में बिजली विभाग में उपकरणों की खरीदी में बड़े पैमाने पर भष्टाचार कर घटिया स्तर के ट्रांसफार्मर, डीपी और तार खरीदे गए जो अब खराब हो रहे हैं जिसके चलते बिजली गुल हो रही है। इसलिए सरकार ने फैसला किया है कि पिछली सरकार में खरीदे गए घटिया बिजली उपकरणों की जांच होगी। इसके साथ ही सरकार ने फैसला किया है कि दस सालों मे जो भी बिजली से संबंधित उपकरण खरीदे गए है उनकी परफॉर्मेस ऑडिट रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी।
खरीदी में अरबों का घपला
सूत्र बताते हैं कि प्रदेश में विगत 15 साल के दौरान घटिया बिजली उपकरणों की खरीदी में अरबों रूपए का घपला किया गया है। आम आदमी पार्टी इस मसले को बराबर उठती रही है। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा की गई करोड़ों की खरीदी विवादों में रही है। कंपनी के अधिकारियों ने रिश्वत के लालच में कस्बा नरसिहंगढ जिला राजगढ मप की एक कंपनी से नाकोडा के मीटर सत्तर हजार से अधिक खरीदे है। इन मीटरों में एक पुश बटन है जिसे दबाने पर लाइट तो जलती है लेकिन मीटर नहीं चलता। वहीं कम्प्यूटर की खरीदी में भी हेराफेरी की गई है। यही नहीं घटिया वायर खरीदकर भी सरकार को चपत लगाई गई है। ग्वालियर में बिजली कंपनी से जुड़े एक व्यक्ति ने खरीदी गई एलमुनियम की तार व अन्य सामान की खरीददारी की जानकारी जुटाकर लोकायुक्त में शिकायत की है। सूत्रों के अनुसार घटिया स्तर से औद्योगिक ईकाईयों एंव घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली सप्लाई की जा रही है। इसमें एल्युमिनियम 60 से 70 प्रतिशत और लोहा 30 से 40 प्रतिशत होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं हुआ है।
प्रदेश में 33 केवी क्षमता वाले उपकेंद्रों तक बिजली सप्लाई के लिए बिछाई गईं ट्रांसमिशन लाइनों में अमूमन जुलाई और अगस्त में फॉल्ट आते हैं। दरअसल, इन दो महीनों में बाकी महीनों के मुकाबले बिजली की खपत ज्यादा होती है और उपकेंद्रों पर लोड काफी बढ़ जाता है, लेकिन इस साल मई के शुरुआती दौर में ही ट्रांसमिशन लाइनों में फॉल्ट आने लगे हैं। इससे लाइनों की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं, हालांकि लेसा अफसर लोड बढऩे को इसकी वजह बता रहे हैं। उपकेंद्रों से 11 केवी लाइन के जरिए छोटे ट्रांसफार्मर तक बिजली पहुंचती हैं, जहां से आम उपभोक्ताओं के घरों तक सप्लाई होती है। उपकेंद्र में खराबी आने पर 7 से 10 हजार घरों की बिजली गुल हो जाती है, जबकि एक ट्रांसमिशन लाइन से कई उपकेंद्र जुड़े होते हैं। अगर इस लाइन में खराबी आ जाए तो कम से कम 50 हजार घरों की बिजली सप्लाई बाधित हो जाती है। ट्रांसमिशन लाइन का फॉल्ट 15 मिनट बाद भी सही कर दिया जाए तो एक घंटे तक बिजली सप्लाई बाधित रहती है। एक्सपट्र्स के मुताबिक, फॉल्ट सही होने के बाद अचानक सभी उपकरण जलते हैं। इस दौरान लोड अचानक बढ़ता है, जिससे दोबारा फॉल्ट की आशंका होती है। ऐसे में उपकेंद्रों से एक-एक फीडर कर सप्लाई दी जाती है।
बिजली सब-स्टेशनों की ऑपरेटिंग में बड़ा घोटाला
प्रदेश में बिजली सब-स्टेशनों की ऑपरेटिंग में भी बड़े घोटाले की बू आ रही है। दिसंबर 2017 में यह मामला सामने आया था, लेकिन उसे दबा दिया गया। उस समय 30 जिलों के नियंत्रण और अधिकार क्षेत्र वाली पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी के 1018 सब-स्टेशनों की ऑपरेटिंग ठेके पर सवाल उठे थे। सब-स्टेशनों पर निर्धारित कर्मचारी रखने और उनकी योग्यता को लेकर यह सवाल उठ थे। शिकायतों के बाद 18 सब-स्टेशनों की प्रथम दृष्टया जांच में सामने आया है कि एक सब-स्टेशन में चार ऑपरेटर की जगह दो से तीन लोग ही रखे गए और जो रखे गए हैं, वो भी अप्रशिक्षित हैं। इससे वेतन और ईपीएफ की राशि में घालमेल तो किया ही है, अप्रशिक्षित और अपर्याप्त ऑपरेटरों से मशीनरी खराब होने और शट-डाउन में भी बिजली चालू रहने जैसे हादसे हो रहे हैं। हैरानी की बात है कि ग्रामीण सब-स्टेशनों में 5 और शहरी क्षेत्रों में 3 साल से ठेका व्यवस्था लागू है। ऐसे में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं किए जाने की शिकायतें मिलती रही हैं। पूर्व क्षेत्र कम्पनी ने सब-स्टेशनों की ऑपरेटिंग के लिए करीब 6500 ठेका कर्मी रखे गए हैं। इनमें आधे कर्मचारी सब-स्टेशनों और शेष कार्यालयों और कैश काउंटरों पर लगाए हैं। मप्र यूनाइटेड फोरम की ओर से की गई शिकायतों के बाद ऊर्जा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव इकबाल सिंह ने जांच के निर्देश दिए थे। पूर्व क्षेत्र कंपनी में कई गड़बडिय़ां सामने आई थीं।
निजी कंपनियों को पहुंचाया 50 हजार करोड़ का लाभ
भाजपा ने अपने 15 साल के कार्यकाल में निजी बिजली कंपनियों को करीब 50 हजार करोड़ रूपए का लाभ पहुंचाया है। यह आरोप है आम आदमी पार्टी का। आप आदमी पार्टी के संयोजक आलोक अग्रवाल के अनुसार शिवराज सरकार ने चार गुना अधिक दामों पर बिजली खरीदकर प्रदेश को बड़ी चपत पहुंचाई है। आलोक अग्रवालके अनुसार प्रदेश में बिजली की उपलब्धता के बाद भी तत्कालीन सरकार ने प्राइवेट बिजली कंपनियों को फायदा पहुचाने के लिए उनसे अनुबंध किया और 33 रूपए प्रति यूनिट से लेकर 84 रूपए प्रति यूनिट में बिजली खरीदी। यही नहीं इस समझौते पर उन अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए जो उस समय उस पद पर ही नही थे। अग्रवाल ने बताया कि मध्य प्रदेश में बिजली के दाम महंगे होने के कारणों की पड़ताल करने पर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि प्रदेश सरकार ने 6 निजी कंपनियों से गैर कानूनी समझौते कर 50 हजार करोड़ रूपये का घोटाला किया है। इन कंपनियों से महंगी बिजली खरीदने के कारण आज मध्य प्रदेश की बिजली सबसे महंगी है।
अग्रवाल के अनुसार शिवराज सरकार ने 6 निजी कंपनियों से लगभग 1575 मेगावाट बिजली के समझौते किए थे। वे समझौते गैर कानूनी थे और इन समझौतों के अनुसार बिजली खरीदे या न खरीदें फिक्स चार्ज के 2163 करोड़ रूपए 25 वर्ष तक देने ही पड़ेंगे। जिनमें जेपी बीना पावर सागर, जेपी निगरी जिला सिंगरौली, झाबुआ पावर सिवनी, एमबी पावर अनूपपुर, बीएलए पावर गाडरवारा, पीटीसी के माध्यम से लेन्को अमरकंटक कंपनी शामिल है। इन कंपनीयों से बिजली खरीदी से पहले समझौते प्रतिस्पर्धात्मक बोली के आधार पर होने थे पर इसका खुला उल्लंघन करते हुए 5 कंपनियों के साथ ये समझौते एक ही दिन में 5 जनवरी 2011 को हुए। यह आश्चर्यजनक है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले दो अधिकारी गजराज मेहता और संजय मोहसे उस दिन सम्बंधित पद पर पदस्थ ही नहीं थे और तीन अधिकारियों एबी बाजपेयी, पीके सिंह और एनके भोगल ने एक ही दिन भोपाल में और जबलपुर में समझौतों पर हस्ताक्षर किये। यह साफ बताता है कि समझौतें फर्जी हैं।
वही वर्ष 2016-17 के आंकड़ों में चौका देने वाले आंकड़े सामने आए जिनसे पता चला है कि जेपी बीना पावर से गत 11 महीने में 14.2 करोड़ यूनिट के लिए लगभग 478.26 करोड़ रूपए का भुगतान किया जिससे औसत बिजली दर 33.68 रु/यूनिट पड़ी। इसी प्रकार झाबुआ पवार से खरीदी गयी 2.54 करोड़ यूनिट के लिए 214.20 करोड़ रूपए का भुगतान किया गया जिससे बिजली खरीदी की दर रु 84.33 प्रति यूनिट पड़ी। है। इन कंपनियों को आज 2163 करोड का फिक्स चार्ज का भुगतान किया जा रहा है यह सरकार द्वारा किया अवैधानिक अनुबंधनो के कारण अगले 25 वर्ष तक भरना पड़ेगा, जिसके कारण मध्य प्रदेश की जनता का 50,000 करोड लूट लिया जाएगा।