सही रास्ते पर भारत में हाइवे बनने की रफ्तार, बीते 5 वर्ष में हुई दोगुनी

सही रास्ते पर भारत में हाइवे बनने की रफ्तार, बीते 5 वर्ष में हुई दोगुनी

 
नई दिल्ली 

परिवहन पर नरेंद्र मोदी सरकार का अहम फोकस रहा है. 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने सड़कें और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर खासजोर दिया है. लक्ष्य पूरे करने की दिशा में भारत में हाइवे निर्माण और विस्तार वर्ष 2018-19 में 10,000 किलोमीटर को पार कर गया है. ये संबंधित वित्त वर्ष में 30 किलोमीटर प्रति दिन बैठता है जो 2014-15 वर्ष के 12 किलोमीटर प्रतिदिन से दोगुने से भी ज्यादा बैठता है. 

31 मार्च 2017 को कुल राजमार्ग नेटवर्क 1.14 लाख किलोमीटर था, जो देशभर की सड़कों की लंबाई 58.98 लाख किलोमीटर का करीब 2 फीसदी बैठता है. 2019 के आर्थिक सर्वेक्षण डेटा के मुताबिक ग्रामीण सड़कों की लंबाई की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है, जो करीब 71% है.

सड़क सेक्टर में निवेश बीते पांच वर्ष में तीन गुना बढ़ा है. 2018-19 में ये निवेश 1.58 लाख करोड़ रुपए पर था. इसके लिए निवेश  वित्त पोषण (फाइनेंस) बजटीय सहायता, आंतरिक और बाह्य बजट संसाधनों (IEBR) और प्राइवेट सेक्टर से जुटाया गया. 2018-19 के निवेश की बजटीय सहायता 48% और निजी निवेश 14% रहा.  

राजमार्ग सेक्टर की रफ्तार

रोड सेक्टर भारत की ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) का 3.14%, फ्रेट ट्रैफिक (ढुलाई यातायात) का करीब 69% और पैसेंजर ट्रैफिक (यात्री यातायात) का 90% है. GVA को क्षेत्र, उद्योग या इकॉनमी के एक सेक्टर में उत्पन्न सामान और सेवाओं की मात्रा के तौर पर मापा जाता है.  
 
भारत में राजमार्ग बनने की रफ्तार

बीते पांच वर्ष में जिन अहम परियोजनाओं पर काम हुआ, उनमें ईस्टर्न पेरिफेरल, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और ढोला-सादिया ब्रिज शामिल हैं. ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस का निर्माण राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर वाहनों का दबाव कम करने के लिए किया गया. इसका उद्देश्य दिल्ली से होकर गुजरने वाले वाहनों को, जिन्हें कहीं और जाना होता है, वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराना रहा.     

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे देश में 14 लेन वाला पहला राष्ट्रीय राजमार्ग है. इसमें साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों के लिए भी अलग ट्रैक होने के साथ पर्यावरण को सहेजने वाले उपाय भी होंगे. ढोला-सादिया ब्रिज असम को अरुणाचल प्रदेश से जोड़ता है.

आर्थिक सर्वे 2019 रिपोर्ट में सेक्टर को पेश आने वाली अहम चुनौतियों से निपटने के लिए प्रो-एक्टिव नीतियों और सड़क निर्माण की रफ्तार में तेजी का हवाला दिया गया है. इसमें अप्रूवल लिमिट, अंतर-मंत्रालय समन्वय, अभिनव प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग और जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने की दिशा में अधिकारियों को अधिक शक्ति देना है.